रियासत जम्मू-कश्मीर में अपंग पंचायती राज प्रणाली ही चल रही है। ठीक चार साल पहले मई 2011 में जिस गर्मजोशी के साथ पंचायती चुनाव हुए और ग्रामीण हलकों खासतौर से आतंकवाद प्रभावित इलाकों में भी लोगों ने बढ़-चढ़ कर आतंकी धमकियों को नजरअंदाज कर मतदान कर रियासत में करीब 33 हजार नये पंचायत सदस्यों (सरपंचों पंचों) को निर्वाचित किया।
वह प्रणाली रियासती सरकारों की अनदेखी की वजह से धीरे-धीरे दम तोड़ती नजर आ रही है। चार साल में न तो 73वां संशोधन लागू हुआ और न ही जम्मू-कश्मीर पंचायती राज एक्ट 1989 में ही 73वें संशोधन के बेहतर प्रावधानों को पूरी तरह से शामिल कर लागू किया गया।
पंचायती राज के मूल स्वरूप यानी थ्री टायर पंचायती राज प्रणाली को ही रियासत में लागू ही नहीं किया गया है। हालत तो यह है कि थ्री टायर पंचायत राज सिस्टम के पहले भाग ग्राम पंचायत तो बन गई, लेकिन न तो पंचायत समिति बनी और न ही जिला परिषद। ब्लाक डेवलपमेंट काउंसिल के चुनाव न होने से ग्रामीण विकास अधिकारियों को नोडल अफसर बनाकर प्रशासनिक अधिकार दे दिए गए।