तीनों मामलों में बारामुला के तारिक अहमद वार, कुपवाड़ा के शफात मकबूल वानी और पुलवामा के सुहैल फैयाज नजर शामिल थे। तारिक अहमद वार के मामले में न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने जिला मजिस्ट्रेट, बारामुल्ला के 12 अप्रैल 2024 को पारित हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। वार ने अपनी बहन मुमताज अख्तर के माध्यम से इस आदेश को चुनौती दी थी। अदालत ने पाया कि पुलिस थाना पट्टन में धारा 302 आरपीसी और धारा 7/25 आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी में वार की संलिप्तता थी, जबकि पीएसए आदेश लगभग एक दशक बाद पारित किया गया था। कहा, इस तरह की निर्भरता से संकेत मिलता है कि हिरासत पुराने आधारों पर थी। हिरासत के आधारों में 2024 के लोकसभा चुनावों से जुड़ी कथित गतिविधियों का भी उल्लेख था। कहा, चुनाव पहले ही समाप्त हो चुके थे, माना कि वास्तविक और निरंतर आवश्यकता प्रदर्शित किए बिना प्रतिवादी केवल खोखले दावों के आधार पर निवारक हिरासत को कायम नहीं रख सकते।
पूर्व आतंकी पिता के बेटे पर लगा था पीसीए
न्यायमूर्ति मोक्ष खजूरिया काजमी ने एक अन्य फैसले में शफात मकबूल वानी की पीएसए हिरासत को रद्द कर दिया। यह आदेश जिला मजिस्ट्रेट कुपवाड़ा ने 13 सितंबर 2025 को दिया था। हिरासत के आधारों में वानी की कथित अलगाववादी विचारधारा, उसके पिता का अतीत जिसमें वह पूर्व उग्रवादी थे और 1990 में आत्मसमर्पण कर चुके थे, अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सम्मेलनों में उसके निमंत्रण और यूएपीए व आर्म्स एक्ट के तहत प्राथमिकी में उसकी कथित संलिप्तता का उल्लेख किया था। उच्च न्यायालय ने इस धारणा को कड़ी अस्वीकृति दी कि केवल उसके पिता के अतीत के कारण उसे अलगाववादी विचारधारा से जोड़ा जा सकता है और ऐसी सोच को भ्रामक और इसके परिणामस्वरूप हुई हिरासत को विवेकहीन तरीके से शक्ति का प्रयोग बताया।
उच्च न्यायालय ने वानी से कथित रूप से बरामद साहित्य पर भी विचार किया और कहा कि एक शैक्षणिक विद्वान होने के नाते, विभिन्न प्रकार की साहित्यिक सामग्री का कब्जे में होना अपने आप में उसे राष्ट्र-विरोधी करार देने का आधार नहीं हो सकता। न्यायालय ने कहा, परेशान करने वाले या विवादास्पद शीर्षकों वाली पुस्तकों का मात्र कब्जे में होना, अपने आप में, किसी व्यक्ति को ऐसा अपराधी नहीं बनाता जिसके खिलाफ निवारक हिरासत आवश्यक हो। इसके साथ ही हिरासत आदेश रद्द कर दिया गया और वानी को निवारक हिरासत से तत्काल रिहा करने का निर्देश दिया गया।
ओजीडब्ल्यू के आरोप में लगा था पीएसए
न्यायमूर्ति एमए चौधरी ने जिला मजिस्ट्रेट पुलवामा के हरिपरिगाम, अवंतीपोरा के सुहैल फैयाज नजर के खिलाफ 10 जुलाई 2025 को पारित हिरासत आदेश को रद्द कर दिया। हिरासत डोजियर में यूएपीए के तहत प्राथमिकी संख्या 46/2021 में नजर की पूर्व संलिप्तता और प्रतिबंधित आतंकवादी संगठनों के लिए ओजीडब्ल्यू के रूप में काम करने के आरोपों का उल्लेख था। हालांकि, अदालत ने पाया कि जमानत पर रिहा होने के बाद ऐसा पर्याप्त रूप से विशिष्ट या निकटवर्ती सामग्री उपलब्ध नहीं थी, इससे यह वास्तविक संभावना दिखाई दे कि वह राज्य की सुरक्षा के प्रतिकूल गतिविधियों में शामिल होगा।
न्यायालय ने कहा, निवारक हिरासत का आशंकित भविष्य के आचरण के साथ जीवंत और निकट संबंध होना चाहिए और इसे केवल पिछले आपराधिक मामलों या पुराने सामग्री का हवाला देकर कायम नहीं रखा जा सकता। उच्च न्यायालय ने फैसला सुनाया कि श्री अमरनाथ जी यात्रा के आसपास सुरक्षा संबंधी चिंताओं का सामान्य संदर्भ, किसी विशेष बंदी को आशंकित सुरक्षा खतरे से जोड़ने वाली विशिष्ट सामग्री का स्थान नहीं ले सकता। अदालत ने भरोसा की गई सामग्री उपलब्ध न कराने और यह स्थापित करने में विफलता से संबंधित कमियां भी पाईं कि हिरासत के आधारों को बंदी को प्रभावी रूप से उसकी समझ में आने वाली भाषा में बताया गया था।
न्यायमूर्ति चौधरी ने कहा, हालांकि अदालत हिरासत प्राधिकारी की व्यक्तिपरक संतुष्टि पर अपीलीय प्राधिकारी के रूप में नहीं बैठती, लेकिन जहां ऐसी संतुष्टि पुराने या अस्पष्ट सामग्री पर आधारित हो या संवैधानिक सुरक्षा उपायों की अनदेखी की गई हो, वहां अदालत मूक दर्शक बनी नहीं रह सकती। नजर की हिरासत रद्द कर दी गई और अधिकारियों को निर्देश दिया गया कि यदि किसी अन्य मामले या कार्यवाही में उसकी हिरासत आवश्यक नहीं है, तो उसे तत्काल रिहा किया जाए।
रहबर-ए-तालीम के तहत नियुक्ति की मांग वाली याचिका 10 साल बाद खारिज
उच्च न्यायालय ने तत्कालीन रहबर-ए-तालीम (आरईटी) योजना के तहत नियुक्ति की मांग करने वाली करीब एक दशक पुरानी रिट याचिका खारिज कर दी है। न्यायमूर्ति वसीम सादिक नरगल ने कहा, अब ऐसी राहत देना उस योजना को प्रभावी रूप से पुनर्जीवित करने के समान होगा, जो पहले ही बंद हो चुकी है और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के विपरीत है। राजोरी के थंगरियोट की कविता देवी ने सरकारी मिडिल स्कूल, थंगरियोट में एक अन्य उम्मीदवार की आरईटी शिक्षक के रूप में नियुक्ति को चुनौती दी थी और नियुक्ति के लिए अपने दावे पर विचार करने की मांग की थी।
याचिकाकर्ता ने दावा किया कि उसने 2004 में जारी एक विज्ञापन के तहत आवेदन किया था और तीन विज्ञापित पदों के लिए उसे क्रम संख्या 3 पर रखा गया था, जबकि निजी प्रतिवादी अमित कुमार क्रम संख्या 4 पर था। उसने आरोप लगाया कि अधिक मेरिट होने के बावजूद निजी प्रतिवादी को बाद में आरईटी शिक्षक के रूप में नियुक्त कर दिया गया। उसने आगे आरोप लगाया कि निर्धारित अवधि समाप्त होने के बाद निजी प्रतिवादी के आवेदन और अतिरिक्त अंकों पर विचार किया गया, जिससे चयन प्रक्रिया की निष्पक्षता और वैधता पर सवाल उठे।
उच्च न्यायालय ने जम्मू-कश्मीर केंद्र शासित प्रदेश व अन्य बनाम सबा वानी में सुप्रीम कोर्ट के बाद के फैसले का उल्लेख किया, जिसमें तैयार चयन पैनलों से उत्पन्न अधिकारों को संरक्षित किया गया था, लेकिन स्पष्ट रूप से कहा गया था कि उसके निर्देश आरईटी योजना को पुनर्जीवित नहीं करेंगे या ऐसे चयन पैनलों से बाहर के व्यक्तियों के लिए नई नियुक्ति के अधिकार पैदा नहीं करेंगे। न्यायमूर्ति नरगल ने कहा, सुप्रीम कोर्ट के निर्धारित कानून के मद्देनजर याचिका निष्फल हो गई है, मांगी गई नियुक्ति प्रदान करना शीर्ष अदालत के निर्देशों के सीधे विपरीत होगा। तदनुसार रिट याचिका खारिज कर दी गई, सभी लंबित आवेदन निस्तारित कर दिए गए और अंतरिम निर्देश, यदि कोई हों, समाप्त कर दिए गए।