वंधामा में रास्ता आज भी उन्हीं घरों के बीच से गुजरता है, लेकिन घरों के भीतर जिंदगी नहीं है। कहीं टूटी खिड़की है, कहीं ढहती दीवार, कहीं झाड़ियों में दबा आंगन और कुछ ऐसा मकान भी हैं जिनके दरवाजे दशकों से खुले हैं। गांव की आबादी बढ़ी है, रास्ते बदले हैं और आसपास नए मकान खड़े हो गए हैं, लेकिन गांव का एक हिस्सा आज भी उस रात की खामोशी अपने भीतर समेटे है। कश्मीरी पंडितों के ये घर जैसे समय को वहीं रोककर खड़े हैं... 25 जनवरी 1998 की उस रात पर, जब चार परिवारों के 23 सदस्यों की आतंकियों ने गोली मारकर हत्या कर दी थी।
शाम ढलते ही इन मकानों की वीरानी और गहरी नजर आती है। गांदरबल जिले के वंधामा गांव में मुख्य सड़क से करीब 400 मीटर भीतर पहुंचने पर पुराने ईंट-पत्थर के मकान दिखाई देने लगते हैं। तीन मकान सड़क की एक तरफ हैं और एक मकान सड़क पार। चारों के बीच बहुत ज्यादा दूरी नहीं है। थोड़ी दूरी पर स्थानीय मुस्लिम परिवारों के घर हैं। यानी जिन घरों में उस रात 24 लोग मौजूद थे, वे गांव की आबादी से अलग-थलग नहीं थे।
आज इन मकानों के भीतर जिंदगी का कोई निशान नहीं बचा है। छतें और दीवारें धीरे-धीरे ढह रही हैं। टूटी खिड़कियों और मेहराबों से झाड़ियां बाहर निकल आई हैं। दालान और आंगन वीरान हैं। आज इन खंडहरों को देखकर अंदाजा लगाना मुश्किल है कि कभी यहां समृद्ध परिवारों की जिंदगी बसती थी, बच्चे आंगनों में खेलते थे और पड़ोसियों का आना-जाना लगा रहता था।
गांव के रहने वाले सुहेल अहमद गनी को आज भी उस रात की गोलियों की आवाज याद है। वह रात शब-ए-कद्र की थी। अगली सुबह इन घरों के बाहर खून से सने 23 शव थे। मरने वालों में नौ महिलाएं और चार बच्चे भी थे। उस रात के बाद गांव बदलता गया, लेकिन इन मकानों से जुड़ा सवाल वहीं रह गया...आखिर उस रात यहां हुआ क्या था? हमलावर कौन थे? उन्हें इन परिवारों के बारे में इतनी सटीक जानकारी कैसे थी? और सबसे बड़ा सवाल, जांच उन लोगों तक क्यों नहीं पहुंच सकी, जिन्होंने 23 लोगों की जान ली? अब करीब 28 साल बाद राज्य जांच एजेंसी (एसआईए) ने इस नरसंहार की फाइल दोबारा खोलनी शुरू की है। उम्मीद है कि इस बार शायद उस रात का सच सामने आ सके।
उस रात आखिर हुआ क्या था?
वंधामा की उस रात को समझने के लिए स्थानीय लोग आसानी से नहीं खुलते। मोहम्मद अलीम ने बड़ी मुश्किल से बताया कि 1990 के दशक की शुरुआत में जब कश्मीरी पंडित परिवारों का घाटी से पलायन शुरू हुआ तो हमने अपने पंडित पड़ोसियों से रुकने की अपील की। मोती लाल, शादीलाल, बद्री नाथ, काशी नाथ और सुदर्शन इसपर राजी हो गए। इन परिवारों के बीच वर्षों से पड़ोसी के रिश्ते थे और खुशियों से लेकर दुख तक एक-दूसरे के साथ साझा होते थे।
फिर 25 जनवरी की रात सब कुछ बदल गया...
पनुन कश्मीर के अमृत कौल के मुताबिक, घटना के बाद उनका प्रतिनिधिमंडल वंधामा पहुंचा था। उस नरसंहार में चारों परिवारों में से सिर्फ 14 वर्षीय विनोद कुमार धर जीवित बचे थे। बद्री नाथ के इस बेटे ने उस रात अपने सामने परिवार के सदस्यों को खोया। उपलब्ध विवरण के अनुसार, रात करीब 10 बजे सेना की वर्दी पहने आतंकी घर पहुंचे। बद्री नाथ ने दरवाजा खोला। इसके बाद हमलावरों ने सामान्य बातचीत का माहौल बनाए रखने की कोशिश की। बुखार की दवा मांगी और फिर चाय भी पी। रात बढ़ती गई और कुछ ही देर में आसपास के दूसरे पंडित परिवारों के घरों तक भी हमलावर पहुंच गए।
इसके करीब एक घंटे बाद हालात पूरी तरह बदल गए। चारों परिवारों को एक जगह जुटाया गया और फिर गोली मार दी गई। विनोद ने किसी तरह खुद को हमलावरों की नजर से बचाया। वह ऊपरी मंजिल पर रखे सूखे गोबर के ढेर के पीछे छिप गए और वहीं से अपने परिवार के लोगों को मरते देखा। अगली सुबह सुरक्षा एजेंसियों ने विनोद को अपने संरक्षण में ले लिया। इसके बाद उनकी जिंदगी भी सार्वजनिक नजरों से दूर हो गई। वह आज कहां हैं, क्या कर रहे हैं और क्या कभी अपने पुश्तैनी घर को देखने वंधामा लौटे, इन सवालों के जवाब सार्वजनिक तौर पर सामने नहीं आए हैं। सुरक्षा कारणों से उसकी तस्वीर भी सार्वजनिक नहीं की गई।
इतनी सटीक जानकारी हमलावरों के पास कैसे थी?
आतंकियों को किस घर में कौन रहता है, यह कैसे पता था? उस रात कौन-कौन लोग मौजूद हैं, इसकी जानकारी उन्हें किसने दी? क्या यह जानकारी पहले से जुटाई गई थी या हमलावरों ने मौके पर पहुंचकर परिवारों की पहचान की? और क्या किसी स्थानीय व्यक्ति की मदद या सूचना ने उन्हें इन घरों तक पहुंचने में मदद की? यही सवाल आज दोबारा शुरू हुई जांच की अहम कड़ी बन सकते हैं।
गांव में यादें बची हैं, घरों में नहीं
स्थानीय निवासी आसिफ अहमद भट बताते हैं कि आज इन मकानों की सबसे बड़ी पहचान उनका खालीपन है। इन घरों के भीतर अब लगभग कुछ भी नहीं बचा है। छतों और दीवारों पर समय की मार साफ दिखाई देती है। कई हिस्से गिर चुके हैं। ईंटें बिखरी हैं। पत्थरों के बीच उग आई झाड़ियां घर की पुरानी बनावट को ढक रही हैं। इन खंडहरों के पीछे सिर्फ एक खाली मकान की कहानी नहीं है। हर घर के पीछे एक परिवार है, एक नाम है और एक अधूरी कहानी है। 25 जनवरी 1998 की रात के बाद इन घरों में फिर कोई परिवार नहीं लौटा। गांव में जिंदगी आगे बढ़ती रही, लेकिन इन मकानों की घड़ियां जैसे उसी रात रुक गईं।
और पांच महीने में जांच अनट्रेस्ड ?
वंधामा हत्याकांड का मामला 15 जून 1998 को ‘अनट्रेस्ड’ कर दिया गया। यानी घटना के करीब पांच महीने के भीतर जांच इस निष्कर्ष पर पहुंच गई कि आरोपियों का पता नहीं लगाया जा सका। यहीं से एक बड़ा सवाल सामने आता है...क्या उस समय जांच की सभी संभावित कड़ियों को पूरी तरह खंगाला गया था?