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Jammu News: कक्षाओं के लिए कमरे नहीं, बरामदे में बैठकर पढ़ रहे बच्चे

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कैसी है पाठशाला :
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सतीश वालिया
जम्मू। जो उलझ कर रह गई है फाइलों के जाल में, गांव तक वह रोशनी आएगी कितने साल में...। मशहूर देसज कवि अदम गोंडवी ने ये लाइनें सरकारी तंत्र में उलझे गांवों के हालात पर लिखी थीं जो जम्मू के सरकारी स्कूलों पर भी एकदम फिट बैठती हैं।
शिक्षा विभाग सरकारी स्कूलों में छात्रों की घट रही संख्या को लेकर चिंतित जरूर है लेकिन स्कूलों के हालात सुधारने का कोई गंभीर प्रयास वह नहीं कर रहा। आलम यह है कि कम छात्रों की वजह से मर्ज कर दिए गए स्कूलों में कक्षाओं के लिए ही कमरे पूरे नहीं पड़ रहे। अमर उजाला की तफ्तीश में तस्वीर कुछ ऐसी दिखी...
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एलकेजी से पहली तक के बच्चे बरामदे में पढ़ रहे

सिटी चौक स्थित हाईस्कूल का हाल बेहाल है। यहां 10 कमरों में 13 कक्षाएं ली जा रही हैं। कमरों की कमी की वजह से एलकेजी से लेकर पहली कक्षा तक के बच्चों को बरामदे में बिठाकर पढ़ाया जा रहा है। यह स्कूल 1970 के दशक से चल रहा है। तब से लेकर अब तक स्कूल के ढांचे में कोई सुधार नहीं हुआ। स्कूल में कुल 171 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं। स्कूल में दो कमरे इतने जर्जर हैं कि बारिश में उनकी छत से पानी टपकता है। लाइब्रेरी का भी हाल ऐसा ही है। पानी के रिसाव की वजह से यहां किताबें खराब हो रही हैं।




कमरे चार और कक्षाएं 11, पंखे तक नहीं

सरकारी मिडिल स्कूल बख्शी नगर की हालत भी जुदा नहीं। यहां केवल चार कमरे हैं जिनमें 11 कक्षाएं लगाई जा रही हैं। स्कूल में 80 से ज्यादा विद्यार्थी पढ़ाई कर रहे हैं। वर्ष 1990 में शुरू हुए इस स्कूल में सबसे ज्यादा परेशानी बारिश के दिनों में पेश आती है। कमरों की दीवारें सीलन से भर जाती हैं। कमरे पूरे न होने की वजह से बच्चों को बरामदे में बिठाकर भी पढ़ाई करवाई जाती है।



कमरे पूरे न होने से लैब तक नहीं खुल सकी

रेशमघर कालोनी स्थित सरकारी हाईस्कूल की भी व्यथा अलग नहीं। यहां नौ कमरों में 13 कक्षाएं चल रही हैं। कमरों के अभाव में गणित और साइंस की लैब तक नहीं खुल पाई है। स्कूल में 110 छात्र पढ़ रहे हैं। वर्ष 1980 में खुले इस स्कूल में एलकेजी से लेकर पहली कक्षा तक के छात्र एक साथ ही पढ़ाई करते हैं। बीते 15 साल में यहां की समस्या कई बार शिक्षा विभाग तक पहुंची है। लेकिन कुछ नहीं हुआ। आज की तारीख में यहां पंखे तक भी नहीं।





फंड जारी कर रहे....

स्कूलों में अतिरिक्त कमरों के लिए फंड जारी कर रहे हैं। जो स्कूल बच गए हैं, वहां प्राथमिकता से काम करवाया जाएगा। सरप्लस अध्यापकों को भी हटाया जाएगा।

-मुश्ताक अहमद, संयुक्त निदेशक, शिक्षा निदेशालय



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शहरी क्षेत्रों में छह हजार शिक्षक सरप्लस

वर्ष 2018 से अब तक सात बार सूची तैयार पर कार्यवाही नहीं
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में हायर सेकेंडरी और हाईस्कूल मिलाकर छह हजार शिक्षक सरप्लस हैं। इन इलाकों में 300 हायर सेकेंडरी स्कूल आते हैं। इनमें शिक्षकों के साढ़े चार हजार पद स्वीकृत हैं लेकिन दो हजार अध्यापक सरप्लस चल रहे हैं।
इसी तरह हाई कम मिडिल स्कूलों की संख्या सात सौ के करीब हैं। इनके लिए साढ़े 10 हजार पद स्वीकृत हैं लेकिन चार हजार शिक्षक सरप्लस हैं।

अकेले जम्मू शहर की ही बात की जाए तो यहां 12 हायर सेकेंडरी स्कूल हैं। इनमें 150 पद स्वीकृत है लेकिन 40 शिक्षक सरप्लस हैं। एक स्कूल में तो केवल 15 पद मंजूर होने के बावजूद 20 से 22 अध्यापक सेवाएं दे रहे हैं।

मौजूदा समय में शिक्षा निदेशालय, राज्य शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एससीईआरटी और मुख्य शिक्षा अधिकारी यानी सीईओ कार्यालय में भी 50 से ज्यादा शिक्षकों को अटैच किया गया है।

शहर में तैनाती करवाने के पीछे ज्यादातर ने स्वास्थ्य, सीमावर्ती इलाकों में तनाव और परिवारिक परेशानी को कारण बताया है। हालांकि, शिक्षा निदेशालय 2018 से लेकर अब तक सात बार इन्हें वापस भेजने के लिए सूची तैयार कर चुका है लेकिन अभी तक सरप्लस अध्यापकों को हटाया नहीं जा सका है।
शिक्षा निदेशालय का कहना है कि वर्ष 2016 से पहले अध्यापकों ने अपने नजदीकी स्कूलों में अटैचमेंट करवाया था। वर्ष 2020 और 2021 में कोरोना की वजह से बात आगे नहीं बढ़ी तो 2022 में सूची तैयार हो जाने के बावजूद प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी।
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जम्मू शहर से लगते स्कूलों में हालत

स्कूल स्वीकृत पद सरप्लस
चंगग्ररवां (मिडिल) 12 4
मुंशी चक (मिडिल) 8 4
कबीर काॅलोनी (मिडिल) 12 2
नगरोटा ग्रामीण (मिडिल) 7 4
डोरी डंगर ग्रामीण (हायर सेकेंडरी ) 12 - 3

ड्यूटी गांव में, पढ़ा रहे शहर में

कुछ मामलों में सामने आया है कि अध्यापकों को ग्रामीण इलाकों में तैनात किया गया था। मगर घर से दूर जाने के बजाए वे अटैचमेंट करवाकर शहर के ही स्कूलों में पढ़ाते रहे। कई बार शिक्षा विभाग के पास इस संबंध में शिकायतें पहुंचीं, मगर कार्रवाई कोई नहीं हुई।
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