कारगिल विजय दिवस केवल एक तारीख नहीं, बल्कि उन 527 अमर बलिदानियों के अदम्य साहस की जीवंत गाथा है, जिन्होंने देश की आन-बान और शान के खातिर अपने प्राण हथेली पर रख दिए थे। जब मोर्चे पर गरजती बंदूकों ने आसमान को धुएं से पाट दिया, तब हमारे रणबाकुरों ने दुश्मन के सीने पर तिरंगा फहराने के लिए अपने सीने अड़ा दिए और उफ तक नहीं की।
इस महासमर की स्वर्णिम गाथा कैप्टन विक्रम बत्रा के उस ओजस्वी संकल्प के बिना अधूरी है, या तो तिरंगा फहराकर वापस आऊंगा, या तिरंगे में लिपटा हुआ आऊंगापर आऊंगा जरूर। कैप्टन मनोज कुमार पांडे का अदम्य पराक्रम, कैप्टन हनीफुद्दीन की जांबाजी, कैप्टन सचिन अन्नाराव निम्बालकर, लेफ्टिनेंट बलवान सिंह और कैप्टन नेइकेझाकुओ केंगुरुसे का अभूतपूर्व नेतृत्व यह सब महज नाम नहीं, बल्कि भारत मां के वे सूर्य हैं जिनके प्रकाश से आज भी हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा है।
देश की माताओं ने अपने 527 कलेजे के टुकड़ों को हंसते- हंसते इस पावन यज्ञ में होम कर दिया। आज जब हम उन बर्फीली चोटियों को याद करते हैं, तो हमारा सीना गर्व से फूल जाता है और आंखें उन वीर माताओं के चरणों में नतमस्तक हो जाती हैं। यह विजयगाथा हमारी अनंत संवेदना, अटूट सम्मान और भारतीय सेना के शौर्य का वह अमर दस्तावेज है, जो युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रधर्म का पाठ पढ़ाता रहेगा।