सवाल: जिस वक्त जम्मू-कश्मीर और लद्दाख एक थे, उस हालात से आप भली भांति परिचित हैं। आज लद्दाख अलग है, उसकी चुनौतियां आपकी नजर में क्या हैं?
लद्दाख की शुरू से ही यूटी के लिए मांग रही है। हमेशा से वहां के लोगों ने खुद को उपेक्षित महसूस किया है। जब यहां पर सरकारें रहीं, लद्दाख के लगता रहा कि उसे इग्नोर भी किया गया। पहले हिल काउंसिल उनका नारा था।
उसके बाद पांच अगस्त 2019 को बिल पास कर इसे अलग यूटी का दर्जा दे दिया गया, वो भी बिना विधानसभा के। पहले भी वहां से चार सदस्य विधानसभा के सदस्य हुआ करते थे। हिल काउंसिल आज भी अपने आप में सक्षम है। वहां के लोगों की मांग के बाद ही पांच जिलों का गठन किया गया। समय-समय उनकी मांग के हिसाब से विकास के काम हुए हैं। विश्वविद्यालय, काॅलेज और भी बहुत कुछ केंद्र ने यहां दिए हैं। दूरदराज का इलाका होने के कारण लद्दाख में संसाधनों की दिक्कत रही। वर्ष 2018 में प्रधानमंत्री के साथ हम सब गए और जोजिला टनल का उद्घाटन किया था। आज वह तैयार होने वाली है। केंद्र से लोगों की बहुत अपेक्षाएं, वो पूरी हों, मेरा ऐसा प्रयास रहेगा।
सवाल: अनुभव होने के नाते आपको एक बड़ी जिम्मेदारी मिली है, आपकी प्राथमिकताएं क्या होंगी?
इस बारे में इस वक्त कुछ कहना बहुत जल्दबाजी होगी। ठीक है कि विकास के साथ-साथ बहुत से लोगों की रोजमर्रा की समस्याएं रहती हैं। लोगों की अपेक्षाएं होती हैं। मैं जनता से और अफसरों के साथ मिल बैठकर जानकारी करूंगा। उसके बाद ही कुछ कह पाऊंगा। मुझे एक माह का समय दीजिए।
सवाल: आप भी जम्मू से हैं, चीफ सेक्रेटरी भी जम्मू से। यहां के लोगों को लद्दाख में जिम्मेदारी दिए जाने की वजह क्या है?
मैं और चीफ सेक्रेटरी ही नहीं, बल्कि डीजी भी यहीं के हैं। जम्मू से लद्दाख की ओर जाना कोई विशेष बात नहीं है। केंद्र शासित प्रदेश में देश के किसी भी कोने से अफसर-प्रशासक लिए जा सकते हैं। लद्दाख नया यूटी है। यही वजह है कि जो अनुभवी हैं, उन्हें वहां भेजा गया है। स्थानीय अफसरों को भी मौके मिलते हैं, कुछ को बाहर भेजा जाता है। केंद्र शासित प्रदेश में इस तरह के प्रावधान रहते हैं।
सवाल: लद्दाख की स्वायत्ता और छठवीं अनुसूची का मुद्दा ज्वलंत है। आपका इन मुद्दों पर क्या कहना है?
केंद्र सरकार का प्रतिनिधि होने के नाते उनके साथ बात करने के बाद ही मैं कुछ कहूंगा। अभी इस पार बात करना जल्दबाजी होगी।
सवाल: चीन की चुनौती और लद्दाख के सामरिक महत्व को लेकर आप क्या कहेंगे?
निश्चित तौर पर यह एक बड़ी चुनौैती है। विदेश मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय की इस चुनौती मेंं खास भूमिका है। सीधे तौर पर इस ममले पर मेरा कुछ भी कहना गलत होगा।
सवाल: लद्दाख की चिंता उसकी स्वायत्तता, उसकी पहचान और संस्कृति के संरक्षण की है। इसे बचाकर वहां की जनता का दिल कैसे जीतेंगे, क्या कोई रोडमैप है, इसके लिए?
लद्दाख की जनता के दिल जीतने की चुनौती को मैं स्वीकार करता हूं, एक महीने बाद जब हम फिर अमर उजाला के साथ बैठेंगे तो एक रोडमैप भी होगा और उनकी अपेक्षाओं पर खरा उतरने की शुरुआत भी हो चुकी होगी।
संबंधित वीडियो