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Interview : तरक्की का सफर... तकनीक और आस्था की विजय गाथा है कटड़ा-श्रीनगर रेल प्रोजेक्ट, शिल्पी से संवाद

Thu, 05 Jun 2025 06:48 AM IST
दुष्यंत शर्मा अमर उजाला नेटवर्क, जम्मू

सार

देहरादून निवासी संदीप कहते हैं, इस प्रोजेक्ट से मेरा जुड़ाव तो पहले से था, पर जब नेतृत्व की कमान हाथ में आई, तो मेरे पास समय कम था। चुनौतियां बेशुमार थीं, जिनसे पार पाकर फाइनल टच देना था। संदीप के संघर्ष और चुनौतियों के संदर्भ में रोली खन्ना  ने विस्तृत बातचीत की...कुछ प्रमुख अंश
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चिनाब ब्रिज.... file pic - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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पहाड़ जैसी मुश्किलें। पाताल जैसी चुनौतियां। मौसम और प्रकृति से जुड़े तमाम झंझावात। सबकुछ पत्थर पर दूब उगाने जैसा...कई बार सबकुछ धुंधला सा दिखने लगता। मन कहता कि यह नहीं हो पाएगा...जब-जब ऐसा हुआ, आस्था और विश्वास की रोशनी ने राह दिखाई। सच कहूं तो यूएसबीआरएल प्रोजेक्ट तकनीक और आस्था की विजयगाथा है...यह कहना है इस परियोजना को अंजाम तक पहुंचाने वाली टीम के पूर्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी संदीप गुप्ता का। उन्होंने सितंबर, 2023 में बतौर सीएओ कार्यभार ग्रहण किया। देहरादून निवासी संदीप कहते हैं, इस प्रोजेक्ट से मेरा जुड़ाव तो पहले से था, पर जब नेतृत्व की कमान हाथ में आई, तो मेरे पास समय कम था। चुनौतियां बेशुमार थीं, जिनसे पार पाकर फाइनल टच देना था। संदीप के संघर्ष और चुनौतियों के संदर्भ में रोली खन्ना  ने विस्तृत बातचीत की...कुछ प्रमुख अंश

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ये प्रोजेक्ट कब शुरू हुआ और इसे पूरा होने में कितना वक्त लगा?
प्रोजेक्ट की घोषणा 1994 में हुई थी। 2002 में इसे राष्ट्रीय परियोजना घोषित कर दिया गया। कुल मिलाकर 30 साल का सफर इस प्रोजेक्ट ने पूरा किया है। इसका मुख्य हिस्सा पिछले आठ वर्षों में पूरा हुआ। निश्चित तौर पर सामाजिक-आर्थिक विकास और क्षेत्रीय एकीकरण के लिहाज से यह प्रोजेक्ट गेमचेंजर साबित होगा।

इसे इंजीनियरिंग का बेजोड़ नमूना क्यों कहा जाए, क्या खास है इसमें?
हिमालय की गोद में इंजीनियरिंग का ये चमत्कार है। यह स्वतंत्रता के बाद किया गया भारतीय रेलवे का सबसे चुनौतीपूर्ण बुनियादी ढांचे का कार्य है। यही चीजें इसे बेजोड़ बनाती हैं। कटड़ा-बनिहाल ट्रैक पर तो इनोवेशन के कई रिकॉर्ड बने। यहां पर हमने जो तकनीकें अपनाईं, जो काम किए, वो भारतीय रेलवे के इतिहास में पहली बार हुआ है। इसमें व्यापक न्यू ऑस्ट्रियन टनलिंग मेथड (एनएटीएम), रिजिड ओवरहेड कंडक्टर, लंबा वेल्डेड कम्पोजिट प्लेट गर्डर ब्रिज, बैलास्टलेस ट्रैक इसमें शामिल हैं।
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किन देशों से कंसल्टेंसी व तकनीकी मदद ली गई?
फिनलैंड, जर्मनी, इटली, स्विट्जरलैंड, डेनमार्क, ऑस्ट्रिया, साउथ कोरिया, यूके, यूएसए के विशेषज्ञों की कंसल्टेंसी और तकनीकी सेवाएं ली गईं। स्पेन, चेक रिपब्लिक, सिंगापुर और स्लोवाकिया का भी इसमें योगदान है। उत्तर रेलवे मुख्य संगठन है, जिसका सहयोग मिला। सार्वजनिक उपक्रम में केआरसीएल और इरकाॅन की मदद ली गई। देश की 31 एजेंसियों की मदद इस काम में ली गई।

कितने कर्मचारी इसमें लगे?
उत्तर रेलवे अधिकारियों की संगठनात्मक संरचना का नेतृत्व मुख्य प्रशासनिक अधिकारी (सीएओ) करता है। सीएओ के साथ दो से तीन वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी इंजीनियरिंग के लिए, एक-एक इलेक्ट्रिकल, सिग्नल और दूरसंचार के लिए होता है। इसी तरह जूनियर प्रशासनिक ग्रेड, सीनियर स्केल और जूनियर स्केल के अधिकारियों के साथ 50 लोगों की टीम लगी है। पीएसयू से जुड़ी हर कंपनी के लिए एक कार्यकारी निदेशक की टीम रहती है। इसमें केआरसीएल और आईआरसीओएन कंपनी जुड़ी थी।

मैं समय नहीं दे पाया...मां चल बसीं, पिता अस्पताल में...पता नहीं परिवार मुझे माफ कर पाएगा या नहीं
बातों के लंबे सिलसिले के बीच नम हुई आंखों के कोरों को पोंछते हुए संदीप गुप्ता कहते हैं, आज जब यूएसबीआरएल प्रोजेक्ट को पूरा होते हुए देख रहा हूं, तो मुझे मेरी मां याद आ रही हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं। पिता जो मेरे वक्त न दे पाने की वजह से बहन के पास अस्पताल की चारदीवारी तक सीमित होकर रह गए हैं। जो हमारे अजीज हैं, उन सबको समय नहीं दे पाया। ससुर, पत्नी, बच्चे और बहनें... पता नहीं ये सब मुझे माफ कर पाएंगे या नहीं!

मां आईसीयू में थीं, मैं समय से नहीं पहुंच पाया
संदीप बताते हैं, वर्ष 2014 की बात है। उधमपुर-कटड़ा सेक्शन में कुछ दिक्कतें थीं। इंजीनियर मेरे बिना जाने को तैयार नहीं थे। उसी दौरान घर से खबर आई कि मां को आईसीयू में भर्ती कराया गया है। मैं समय पर नहीं पहुंचा, मेरी बहनों ने मुझे माफ नहीं किया। गया भी तो मां को वार्ड में शिफ्ट कराकर लौट आया। जिस काम को छोड़ा था, वो हो नहीं सका था। मुझे वहां देखना था। लौटते ही मां फिर से आईसीयू में पहुंच गईं। छह यूनिट ब्लड की जरूरत थी। मेरा हौसला देख कर एलएंडटी कंपनी ने अपने छह कर्मियों को ब्लड देने के लिए भेजा। मैं काम खत्म कर रात में लौटा। तब तक मां दुनिया छोड़कर जा चुकी थी।

बीमार पिता ने कहा-तुम काम देखो, मुझे घर छोड़ दो
संदीप कहते हैं, मां के जाने के बाद पिता अकेले पड़ गए। पिता को कई तरह की स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतें हैं। उम्र का तकाजा है। मैं समय दे नहीं पा रहा था, दिल्ली में घर पर जाकर डाॅक्टर का देखना संभव नहीं था। जिस इलाके में हम रहते थे, वहां पानी की समस्या अलग थी। पिता ने मुझे परेशान देखा तो कहा कि तुम अपना काम देखो, उन्हें डाॅक्टर बहन के यहां छोड़ दें। उनको बहन के अस्पताल में रखा गया। 

प्रोजेक्ट में सबसे कठिन पल कौन सा था?
टी-33 सुरंग को तैयार करने का काम सबसे ज्यादा चुनौतीपूर्ण था। अक्तूबर 2017 की बात है। खोदाई शुरू हो चुकी थी। अचानक से एक बड़ी चुनौती आकर खड़ी हो गई। टनल में पानी और मिट्टी का प्रवाह इस कदर हुआ कि सब कुछ ठहर गया। लगभग 20 हजार क्यूबिक मीटर मिट्टी इसमें भर गई। काम रोक दिया गया। विशेषज्ञों की टीम बैठी, कोई हल नहीं निकला। उस वक्त लगा कि हम जितना आगे बढ़े थे, उससे कहीं ज्यादा पीछे धकेल दिए गए। मन में संदेह पैदा होने लगा कि शायद हम सफल न हो पाएं। पूरी परियोजना दांव पर थी। काम बंद हो चुका था। पर, हमने बाधा पार करने की दिशा में अपने प्रयास जारी रखे। मार्च 2022 में सुरंग की खोदाई की एनएटीएम तकनीक के बजाय हमने आई-सिस्टम ऑफ लर्निंग को अपनाया। धीरे-धीरे हमने काम शुरू किया। आखिरकार अक्तूबर 2024 में सुरंग पूरी तरह से तैयार हो गई। यह हमारे लिए उत्सव का पल था।
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