अमर उजाला से बातचीत में गुरनाम सिंह ने बताया कि शिक्षा विभाग में उनकी सेवाएं दुर्गम इलाकों में रही हैं। उन्होंने बडशाला जिला डोडा की सरकारी स्कूल, प्राइमरी स्कूल गूडा पंडिता और फिर लाहड़ी सरकारी स्कूल के ढांचे को बेहतर करने की कोशिश की। गरीब तबके से आने वाले विद्यार्थियों और अभिभावकों को प्रेरित करने का काम किया। उन्हें वर्दियों से लेकर किताबें उपलब्ध कराने और निजी स्कूलों की ही तरह सरकारी स्कूलों में सेवाएं देने की कोशिश जारी रखी।
कहा, आज लगा की भगवान के घर देर है अंधेर नहीं
गुरनाम सिंह ने बताया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चाय पर बुलाया और हमारे अनुभव जाने। केंद्रीय मानव संसाधन मंत्री रमेश पोखरियाल से भी मिलने का मौका मिला। देश के अलग-अलग राज्यों से आए 46 शिक्षकों की अपनी-अपनी गाथाएं थीं, जिसमें अलग-अलग परिस्थितियों में शिक्षकों ने बेहतर काम किया। यह अनुभव साझा कर एक दूसरों को समझने की भी मदद मिली।
मास्टर गुरनाम सिंह ने बताया कि शिक्षा एक बहुत बड़ा दायरा है। 3.72 लाख शिक्षक और बहुत से स्कूल हैं। समग्र या फिर सर्व शिक्षा अभियान के तहत सरकार ने बहुत कुछ किया है, लेकिन अभी बहुत कुछ किया जाना जरूरी है। जिन दुर्गम इलाकों में रहकर सेवाएं दी हैं, वहां समझ में आया कि रूढ़ीवादी सोच किस तरह से आज भी बालिकाओं को शिक्षा से वंचित रख रही है।
बताया कि कई जगह शिक्षा के ढांचे इतनी दूर हैं कि बच्चों खासकर लड़कियों को पहुंचने में दिक्कतें होती हैं। राज्य अब केंद्र शासित प्रदेश बन गया है, उम्मीद है कि केंद्र की ओर से पहले से भी बेहतर तरीके से शिक्षा व्यवस्था को सुधारने काम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि इस राष्ट्रीय शिक्षक पुरस्कार के साथ कई जिम्मेदारियां भी हासिल हुई हैं, जिन्हें निभाने की पूरी कोशिश करूंगा।