इस दौरान अचानक जेहन में जामावार शॉल बुनने की बात आई। काम शुरू किया तो हौसला भी बढ़ता गया। रसूल ने कहा कि तकनीक से बनने वाले शॉल में दो से तीन साल तक का समय भी लगता है। इसका पूरा डिजाइन पहले तैयार करना पड़ता है, फिर उसे सूई धागे से बनाया जाता है। 1990 में पहली बार इस जामावार शॉल को बनाने का काम शुरू किया था जो 2002 में पूरा हो पाया। उन्होंने कहा कि हस्तशिल्प की समझ पिता से विरासत में मिली थी, लेकिन पिता ने भी कभी जमावर शॉल नहीं बनाया था।
कन्नी और सोजनी डिजाइन में बनते हैं ये खास शॉल
रसूल ने कहा कि जामावार शिल्प में कन्नी और सोजनी दो डिजाइन होते हैं। सोजनी कलाकार की भावनाएं रेखांरित करती है। इससे कलाकार के पास एक दृश्य की जरूरत होती है, जिसे वह बयां करता है। सूई से इसे तैयार किया जाता है, जिसमें एक दृश्य के साथ कड़ी मेहनत लगती है। इसमें पशमीना का उपयोग किया जाता है। खास बात है कि तीन से चार पशमीना शॉल जितनी सामग्री एक ही शॉल में लगती है।
नए कारीगरों को सिखा रहे कला
गुलाम रसूल खान ने कहा कि सरकार को हस्तशिल्प को बढ़ावा देना होगा। जामावार शॉल की कला दुर्लभ है, जिसे वह अब नए कारीगरों को सिखा रहे हैं। रसूल ने कहा - सात सौ वर्ष पहले जामावार शॉल 34 टुकड़ों में बनाया गया था। 2003 में मैंने इसे 64 टुकड़ों में बनाया। सरकार ने इसके लिए बाकायदा राज्य अवॉर्ड भी दिया था। 2006 में तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम से राष्ट्रीय पुरस्कार मिला था। 2012 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखजी से शिल्प गुरू अवार्ड मिला था।