पत्थरों की दीवारों और फूस व मिट्टी के लेप वाली छत वाले घर हैं। घरों में न पानी है, न बिजली। बिजली का जुगाड़ लोगों ने पास से गुजरते तारों से कुंडी डाल कर रखा है। यहां पहुंचते ही घर की दहलीज पर आते ही एक महिला रोते-बिलखते बेसुध हो जाती है तो दूसरी पानी लाने के लिए दौड़ती है।
दस मिनट बाद दूसरे घर से पानी लेकर पहुंचती है। उससे पूछा कि पानी का यहां क्या हाल है तो कहती हैं...कहां है पानी। इतने में परवीन अख्तर नामक महिला एक तरफ हाथ से इशारा करते कहती हैं... यह देख लो सरकार ने चार साल पहले पाइप बिछाए हैं। आज तक पानी नहीं आया।पाइप बिछाई लेकिन कनेक्शन देना भूला विभाग
गांव के ही एक बुजुर्ग मोहम्मद शरीफ कहते हैं, आएगा कैसे सड़क पर पाइपों के ढेर लगे हैं। सरकार ने मेन सप्लाई से गांव के पाइपों को जोड़ा ही नहीं है। यह पूछने पर कि पानी कहां से लाते हैं, तो कहते हैं प्रशासन हफ्ते में एक टैंक भेज देता है, बाकी महिलाएं बावलियों से भरकर ले आती हैं। ज्यादा मुश्किल पशुओं को पानी पिलाने में आती है।
परवीन कहते हैं कि मेरे पशु तीन दिन से प्यासे हैं...कहां जाऊं। बिजली का हाल भी कुछ ऐसा ही है। कच्चे घरों के बाहर तार से बल्ब टंगे हैं। अंदर-बाहर कहीं मीटर नहीं है। बल्ब का तार सीधे पास से गुजर रहे तारों की तरफ जाता है। कुंडी से बिजली मिलती है।
सांस फुला देने वाले रास्ते से यहां पहुंचने वाले अधिकारी सब देखते हैं, मगर मौतों के रहस्य से लेकर इस व्यवस्था के लिए कौन जिम्मेदार है, इनके पास कोई जवाब नहीं। गांव के लोग कहते हैं प्रशासन तो आ रहा है, लेकिन न तो कोई सड़क की बात करता है, न पानी की और न ही बिजली की। सब अपना टूर बिल बनाने के लिए आते हैं।दर्द बांटने के साथ राजनीति भी
अभी लोग अपना दर्द बता रहे होते हैं कि पहाड़ों पर बने इन घरों को आती पगडंडी पर तेज कदमों से चलता एक युवा प्रवेश करता है। सब उसको आदाब करने में लग जाते हैं। हरी जैकेट और काला कुर्ता पहने इस युवा के साथ कोई 10 लोग हैं। फुर्ती के साथ यह पांच बच्चों को खोने वाले असलम के घर पहुंचता है।
दुख जताने के लिए बैठ लोग उठकर उसका इस्तकबाल करते हैं। पूछने पर पता चलता है ये पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के स्थानीय नेता हैं। पीडीपी की तरफ से मीडिया का प्रभाव देखते हैं। इनका नाम गुफ्तार चौधरी है। गुफ्तार दुख जताते हैं। मृत बच्चों के लिए अल्लाह से दुआ मांगी जाती है और इसके साथ ही शुरू हो जाती है राजनीति। इनके साथ पहुंचा एक युवक मोबाइल पर वीडियो रिकॉर्डिंग शुरू करता है और जनाब सरकार को घेरने में लग जाते हैं।
कहते हैं कि प्रदेश में एक नहीं दो सरकारें चल रही हैं। एक अब्दुल्ला साहब की और दूसरी एलजी साहब की। दोनों में से कोई तो जवाब दे कि बच्चे क्यों मरे। रिपोर्ट सार्वजनिक की जाए। आवाज में थोड़ी तल्खी लाकर कहते हैं दो दिन का वक्त देते हैं सरकार को, अगर मसला हल नहीं हुआ तो अगले जुम्मा बुद्धल-कोटरंका सड़क पर जाम लगा देंगे।जहां पानी नहीं वहां मलेरिया टीम जांच कर रही
इस गांव की दुश्वारियां कम करने की कोई बात नहीं होती। यहां मास्क लगाए कुछ लोग डायरियां पकड़े कुछ लिखते दिखे...पूछने पर पता चला ये मलेरिया टीम है। इनसे पूछा कि इतने ऊंचे पहाड़ों पर जहां पानी तक नहीं है, मलेरिया का क्या काम, तो एक अधिकारी कहता है विभाग ने ड्यूटी लगाई है। क्या करें। इस पहाड़ पर आना कौन सा आसान है। थक जाते हैं। रोस्टर में बारी-बारी आते हैं। मलेरिया तो है नहीं, लेकिन एहतियातन जांच करनी पड़ रही है।
पहली घटना के पीड़ित फजल के घर पहुंचना एवरेस्ट चढ़ने जैसाआठ दिसंबर, 2024 को बच्चे मरने की पहली घटना बड्डाल गांव के फजल के घर हुई थी। फजल के जीजा यानी असलम के भी पांचों बच्चों की मौत हो गई है। दोनों के घर आमने-सामने हैं, लेकिन बीच में पहाड़ खड़ा है। फजल के घर जाने के लिए भी कोई पक्का रास्ता नहीं है।
सैकड़ों मीटर पहाड़ से पहले नीचे उतरना पड़ता है और फिर ऊबड़-खाबड़ रास्ते को पार कर पहुंचना पड़ता है। स्थानीय लोग कहते हैं कि उनके लिए यहां आना-जाना रोज का काम है। कई शाॅर्टकट हैं, जिनके द्वारा वे पहुंच जाते हैं। बाहर से आया व्यक्ति यहां घंटों पैदल चलकर भी नहीं पहुंच सकता। उसे कई बार सांस लेने के लिए आराम करना पड़ता है। यहां पहुंचना बिना अभ्यास एवरेस्ट चढ़ने जैसा कठिन है। कोई यहां जा भी नहीं रहा, क्योंकि घर पर कोई नहीं बचा है। बच्चों और उनके पिता फजल की मौत हो गई है। पत्नी बची है, वह बेसुध है।
पहली बार यहां गाड़ियों का आना-जाना
खामोश पहाड़ों पर बसे इस गांव में 200 से ज्यादा घर हैं। देखने पर दो घर भी एक साथ नहीं मिलते, मगर कोई पहाड़ों के ऊपर है तो खाई में। पूरी तरफ बिखरे इस गांव में किसी पर संकट आ जाए तो मदद के लिए दूसरे का समय पर पहुंच पाना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन भी है। पहली बार यहां इतने लोगों के कदम पड़े हैं। नहीं तो वोट लेने पांच साल में एक बार नेता आते हैं।
गाड़ियों की आवाज ने भी पहली दफा इस सन्नाटे को चीरा है। हर आने वाली गाड़ी को लोग उत्सुकता की नजर से देखते हैं। बुधवार को गांव में दो महिलाओं अफजल की पत्नी साकिया बेगम और एक अन्य जट्टी बेगम के अचानक बीमार होने पर उन्हें एंबुलेंस से कंडी के अस्पताल ले जाने के लिए स्वास्थ्य विभाग की टीम पहुंची।
इस पर कई महिलाओं में से बामुश्किल एक महिला जाने के लिए तैयार हो पाई। वह भी इस शर्त पर कि छोटे वाली एंबुलेंस में बैठेंगी। न जाने का कारण पूछा तो पता चला इन्हें वाहन में बैठने की आदत ही नहीं है। चक्कर और उल्टी आने से डरते हैं।
माथापच्ची...मौतों पर तो रहस्य है ही, रिश्ते भी समझ से बाहर
मौतों के रहस्य से पर्दा उठाने के लिए यहां कई टीमें बीमारी से हटकर जर, जोरू और जमीन की कहानियां सुलझाने में जुटी हैं। जितना जटिल यह केस है उससे भी जटिल रिश्ते। गुज्जर मुस्लिम समुदाय होने के चलते फजल, रफीक और असलम की शादियां रिश्तेदारी में हुई हैं। फजल और असलम जीजा-साला हैं और रफीक भी रिश्तेदार हैं।
किसी की पत्नी किसी की माैसी, चाची, ताई सब लगते हैं। बड़ी बात ये कि असलम को उसके मामा ने पाल रखा है। वही मामा की जमीन का वारिस है। इससे पहले मामा ने भाई के बेटे को पाला था, उसके साथ रिश्ते मधुर न रहने से अफजल को ही अपने घर रखा था। अब बच्चों के गम में मामा यूसफ गुजर चुके हैं। मामा ने भी दो शादियां कर रखी हैं। ये रिश्ते इतने ज्यादा घुले मिले हैं कि अधिकारियों की डायरी भर जा रही है, पर किसके साथ किसका क्या सीधा रिश्ता है, इनकी माथापच्ची चल रही है।