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अब भी डरा जाती है सैलाब की भयानक यादें

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श्रीनगर में कहर बनकर आए सैलाब में कठुआ से गई खिलाडि़यों की टीम भी फंस गई थी। सेना की मदद से उनको निकालकर वीरवार को जम्मू पहुंचाया गया, जहां से वे देर शाम को कठुआ पहुंचे। अपने घरों में पहुंचने के बाद भी खिलाड़ी सैलाब को याद कर सिहर उठते हैं।
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युवा सेवाएं एवं खेल विभाग की ओर से खेल प्रतियोगिता में हिस्सा लेने के लिए श्रीनगर गए अंडर-19 वर्ग के खिलाडि़यों की टीम कई दिनों तक अपने हास्टल में फंसी रही। संकट की इस घड़ी में भी उन्होंने आपसी समन्वय और साहस से खुद को बचाया।

उन्होंने बाढ़ में बहकर आने वाली खाद्य सामग्री को जमा करने के लिए लकड़ी के फट्टों और रेस्लिंग मैट से नाव बनाई। अपनी एकता, आपसी समन्वय और साहस से ही उन्होंने इस विपरीत परिस्थिति पर काबू पाया। आखिरकार सेना की मदद से वे घर लौटने में कामयाब रहे।
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देखते ही देखते पानी में डूबी इमारत

कठुआ के जिला अस्पताल में स्वास्थ्य जांच के लिए आए खिलाडि़यों के साथ मौजूद इंस्ट्रक्टर पंकज सपोलिया ने बताया कि जम्मू संभाग सहित कश्मीर संभाग के कई जिलों से लगभग 200 बच्चे वजीर पार्क स्थित विभाग के हॉस्टल में ठहरे हुए थे।

सात सितंबर को अचानक पानी का सैलाब आ गया और उनके देखते ही देखते इमारत का ग्राउंड फ्लोर पानी में डूब गया। स्टाफ के सदस्यों ने बच्चों के साथ मिलकर लकड़ी के फट्टों का इंतजाम किया और उन पर रेस्लिंग मैट बांधकर नाव तैयार कर ली।

क्रमवार सभी को बख्शी स्टेडियम पहुंचाया गया। सपोलिया ने बताया कि सात सितंबर के बाद अगले तीन दिनों तक किसी का भी फोन से संपर्क नहीं हो सका। लिहाजा वह संकट में फंस चुके थे।

इन लोगों पर थी खाद सामग्री की जिम्मेदारी

इतनी बड़ी संख्या में बच्चों के लिए खाने पीने का सामान जुटाना मुश्किल हो गया। ऐसे में तैराकी जानने वाले बाग हुसैन, पंकज, अभय सलगोत्रा, रजत सिंह और मुनीष ने बहते पानी में खाने का सामान खोजने की जिम्मेदारी ले ली।

यह बच्चे स्टेडियम से कुछ ही दूरी पर बहते पानी पर तैरते चिप्स, ड्राई फ्रूट सहित अन्य सामग्री ले आते, हालांकि यह सामग्री बेहद कम थी, लेकिन बच्चों को थोड़ा-थोड़ा बांटकर काम चलाया गया। उन्होंने गैस सिलेंडर, चूल्हे का इंतजाम भी कर लिया।

तीन दिन तक स्टोर इंचार्ज को सामान के रखरखाव की जिम्मेदारी दी गई। एक तरह से आपात स्थिति के बावजूद बच्चों और स्टाफ सदस्यों के आपसी समन्वय ने हिम्मत बनाए रखी।

बदहवासी में भी नहीं छूटा इंसानियत का जज्बा

बदहवास करने वाले हालात में भी खिलाडि़यों में इंसानियत का जज्बा कम नहीं हुआ। एक तरफ जहां हर तरफ खुद को बचाने की होड़ मची थी, वहीं स्कूली बच्चों ने दूसरों की परवाह से भी कन्नी नहीं काटी। अभय सलगोत्रा सहित अन्य बच्चों ने बताया कि उन्होंने पास से ही इंसानी शव बहते देखे।

शव देखकर लोग विचलित न हो जाएं, इसका खयाल आते ही उन्होंने शवों को इमारत के खंभों के साथ रस्सों से बांध दिया। एक बच्चे ने तो कुत्ते को बचाने के लिए पचास मीटर दूर तक तैरने का फैसला कर लिया। इस बच्चे को कुत्ते ने काट भी लिया, लेकिन इसके बावजूद उसे बचा लिया गया।

अपने ही दम पर सैलाब से बच निकले युवा

जन्नत में जब जल प्रलय आई तो हर तरफ चीख-पुकार मच गई। बाढ़ के पानी में बहते लोगों को देखकर बड़े-बड़ों का कलेजा कांप जाता था। जब पूरा शहर बाढ़ के पानी की चपेट में आ गया, उसके बाद मुसीबतों का अगला दौर शुरू हुआ।

जिन लोगों के पास भोजन था, वह भी एक-दो दिन में समाप्त हो गया, नजीजतन लोग दाने-दाने को मोहताज होने लगे। जिनके पास खाद्य सामग्री थी, उनको पीनेे के पानी की एक बूंद मयस्सर नहीं थी। ऐसे में न सिर्फ अपने धैर्य को बनाए रखना वरना बाढ़ से सुरक्षित बच निकलना किसी हैरतअंगेज कारनामे से कम नहीं था।

यह कारनामा काउंसिलिंग के लिए श्रीनगर गए महानपुर और सटे इलाकों के युवाओं के एक समूह ने किया। अपनी हिम्मत के दम पर वे अपने घर पहुंचने में कामयाब रहे। काउंसिलिंग में हिस्सा लेने के लिए श्रीनगर गए युवा लाल चौक में ठहरे हुए थे।

तीन दिन तक किया रेस्‍क्यू टीम का इंतजार

जब बाढ़ आई तो युवाओं ने समय रहते पहले सुरक्षित स्थान की तलाश की। इसके बाद उन्होंने वहां से बच निकलने का प्लान बनाया। किसी तरह वे मीलों पैदल सफर तय कर अनंतनाग से किश्तवाड़ के रास्ते कठुआ पहुंचे। युवाओं में शामिल वीशू जंवाल, सिद्धार्थ, लव कुमार, सुरिंदर सिंह, राकेश सिंह, सूरम सिंह, विनय, स्थानीय सरपंच कृपाल सिंह आदि ने बताया कि वे अपने वाहन से वहां गए थे।

बाढ़ का पानी आने से जब अफरातफरी मची तो उन्होंने पानी बढ़ने से पहले ही अपने वाहन निकाले और गवर्नर हाउस चले गए। इस दौरान उन्होंने तीन दिन तक रेस्क्यू टीम का इंतजार किया, लेकिन उन्हें किसी ने जम्मू ले जाने की जहमत नहीं उठाई।

आखिरकार उन्होंने पर्वतीय इलाके का रूट पकड़ा और सीआरपीएफ से रूट की मालुमात हासिल कर 25 किलोमीटर पैदल चलकर अनंतनाग पहुंचने में सफलता हासिल कर ली। वहां से किराए पर वाहन किया और बेहद खराब सड़क मार्ग से होते हुए वह किश्तवाड़ और फिर अपने घर पहुंच गए। युवाओं के घर पहुंचने पर परिजनों की जान ने राहत की सांस ली।
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जब फरिश्ता बनकर आई सेना

हिंदी आती नहीं और टूटी-फूटी अंग्रेजी कोई समझ नहीं पा रहा था। जान मुसीबत में थी। ऐसे में भगवान का अवतार बनकर आई सेना ने मदद की और हम यहां सुरक्षित पहुंच पाए। दक्षिण भारत के चेन्नई से जन्नत देखने आए तमिल परिवार ने जम्मू के टेक्निकल एयरपोर्ट पर पहुंचकर राहत की सांस ली।

मैरी और हिमेश मोहन अपनी बेटी पूजिदा और मां इलियम्मा कूरियाकोस के साथ पहली बार जम्मू-कश्मीर देखने आए थे। पिछले पांच दिनों से श्रीनगर के बाढ़ प्रभावित क्षेत्र में फंसना उनकी जिंदगी का सबसे बुरा अनुभव रहा।

परिवार के किसी सदस्य को हिंदी नहीं आती है। स्थानीय लोग उनकी टूटी-फुटी हुई अंग्रेजी को समझ नहीं पा रहे थे। ऐसे में परेशानी को दूर कौन करता। मैरी कहती हैं कि मैं सेना की शुक्रगुजार हूं कि आज हम जम्मू सुरक्षित आ गए हैं। वह चेन्नई लौट जाएंगे, लेकिन वह फिर कश्मीर आएंगे।
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