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Jammu News: मेजर पुरुषोत्तम निहत्थे ही भिड़ गए थे आतंकियों से, सीने पर गोलियां खाकर दिया बलिदान

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श्रीनगर में मेजर पुरुषोत्तम को श्रद्धांजलि देती सेना। स्रोत सेना - फोटो : संवाद
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-शहीद मेजर पुरुषोत्तम को मीडिया के लोग आज भी करते हैं याद, कहते हैं- सेना और मीडिया के बीच की दूरियां हटाने में उनका बड़ा योगदान
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अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। सीने पर गोलियां लेकर तीन पत्रकारों की जान बचाने वाले शहीद मेजर पुरुषोत्तम और उनके 5 जांबाज साथियों को सेना के साथ-साथ मीडियाकर्मी भी आज बहुत याद करते हैं। 3 नवंबर, 1999 को कोर मुख्यालय पर हुए आत्मघाती हमले में उन्होंने यह शहादत दी थी।
मेजर पुरुषोत्तम सेना की बिहार रेजिमेंट से थे और उन्होंने वर्ष 1997 में सेना की 15वीं कोर (चिनार कोर) में पीआरओ का पदभार संभाला था। उस समय कश्मीर में सेना और जनता के बीच काफी दूरियां थीं। सेना पर अक्सर मानवाधिकार हनन के आरोप लगते थे और आतंकवाद चरम पर था।
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श्रीनगर के वरिष्ठ पत्रकार फैयाज अहमद ने अमर उजाला से बातचीत में उस घटना को याद किया। उन्होंने कहा उन्हें आज भी यकीन नहीं होता कि कैसे मेजर पुरुषोत्तम जैसा शख्स हमारे बीच से उठकर बाहर निकला और वापिस नहीं लौटा। अगर वो अपने दफ्तर से बाहर आतंकियों से लोहा लेने नहीं निकलते तो शायद बच जाते, लेकिन उन्हें हमारे सुरक्षित रहने की चिंता सता रही थी।
फैयाज ने बताया कि किसी स्टोरी की परमिशन के लिए हम तीन पत्रकार मेजर पुरुषोत्तम के कार्यालय पहुंचे थे। शाम करीब 5 बजे अचानक फायरिंग की आवाज़ आई। हमने कहा कि शायद फायरिंग है, लेकिन उन्होंने कहा कि दिवाली नज़दीक आ रही है, पटाखे हैं। लेकिन फायरिंग तेज़ हुई तो एहसास हुआ कि आतंकी हमला है। मेजर पुरुषोत्तम ने हम तीनों को बाथरूम में छुपने को कहा, अपने स्टाफ के कर्मचारी को वहां रखा और खुद बाहर आतंकियों से लोहा लेने निकल पड़े। अपने दफ्तर से बाहर निकलने पर ही वो शहीद हो गए।

मीडिया से थे खास रिश्ते
एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार ने बताया कि मेजर पुरुषोत्तम का एक अलग ही तरीका था। जब भी उनका मन करता, वो प्रेस कॉलोनी में आकर मीडियाकर्मियों के साथ बैठकर चाय पीते और बातचीत करते। उनके कारण सेना की एक अच्छी छवि मीडियाकर्मियों के बीच बनी और दूरियां कम होना शुरू हुई। कारगिल युद्ध के दौरान वो अकेले ऐसे शख्स थे जो 350 से अधिक पत्रकारों को संभाल रहे थे।
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सेना ने दी श्रद्धांजलि
सेना ने करीब दस साल पहले वर्ष 2015 में उनके नाम पर एक ट्रॉफी की घोषणा की, जो कश्मीर में संचालित गुडविल स्कूलों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले स्कूल को दी जाती है। हाल ही में, बादामी बाग छावनी स्थित पीआरओ कार्यालय में एक समारोह आयोजित कर मेजर पी. पुरुषोत्तम, सूबेदार ब्रह्मदास, हवलदार पीके महाराणा, सिपाही चौधरी रामजी भाई, मोहम्मद रजा-उल-हक और सी राधाकृष्णन को श्रद्धांजलि अर्पित की गई, जिन्होंने आतंकवादी हमले के दौरान कार्यालय की रक्षा करते हुए अपने प्राणों की आहुति दी थी।
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