जम्मू-कश्मीर में अकसर नेता और अधिकारी युवाओं को स्पोर्ट्स में भविष्य बनाने की बात कहते दिखते हैं। मगर स्पोर्ट्स में भविष्य बनने का सपना युवाओं के लिए किसी अंधेरे में जाने से कम नहीं है। इसका मुख्य कारण है राज्य में स्पोर्ट्स पॉलिसी यानी खेल नीति का प्रभावी ढंग से लागू नहीं होना। स्पोर्ट्स काउंसिल द्वारा बनाई खेल नीति सरकार की अनदेखी की शिकार है। पिछले वर्ष तैयार की गई नीति को लागू करने में देरी का जवाब खेल विभाग के पास भी नहीं है।
दरअसल खेल नीति के लागू नहीं होने से राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में पदक विजेता खिलाड़ियों की प्रतिभा को प्रोत्साहन नहीं मिल रहा है। सरकार ने कई स्पोर्ट्स पालिसी को लागू करने का आश्वासन तो दिया, लेकिन केवल कागजों तक सीमित रही। इसके कारण खेल के बुनियादी ढांचे का अभाव के साथ खिलाड़ियों की प्रतिभा को पर्याप्त मंच नहीं मिल रहा है।
खेल नीति के अभाव के कारण पिछले चार साल में राज्य के हर जिले में बनने वाले इंडोर स्टेडियम का काम अभी तक पूरा नहीं हो पाया। स्पोर्ट्स काउंसिल से जुड़ी एसोसिएशन को पर्याप्त फंड तक नहीं मिलता है, जिससे खिलाड़ियों के प्रशिक्षण पर भी असर पढ़ता है। इस संबंध में जब खेल विभाग के सेक्रेटरी समरद हाफिज से संपर्क करने की कोशिश की तो उन्होंने फोन का जवाब नहीं दिया।
'स्पोर्ट्स पालिसी का नहीं होना खिलाड़ियों के भविष्य से खिलवाड़ है। खिलाड़ियों को उनकी मेहनत का फल नहीं मिलता है। स्पोर्ट्स पालिसी के अभाव के कारण ही राज्य में खेल ढांचे की कमी है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय खेलों में पदक विजेताओं को नहीं के बराबर प्रोत्साहन मिलता है। खिलाड़ियों को दूसरे राज्यों में प्रशिक्षण के लिए जाना पढ़ता है। इससे खिलाड़ियों को काफी खर्च उठाना पड़ता है।'- राम खजूरिया, माउंटेनियरिंग एसोसिएशन के जरनल सेक्रेटरी
'स्पोर्ट्स पर हर सरकार का रवैया असंवेदनशील रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पदक लाने की बातें तो होती है, लेकिन यहां स्पोर्ट्स ढांचे ना के बराबर हैं। स्पोर्ट्स पालिसी का अभाव युवाओं को स्पोर्ट्स से दूर कर सकता है। अपनी मेहनत के दम पर राज्य का नाम रोशन करने वाले खिलाड़ियों को सरकारों की ओर से प्रोत्साहन नहीं मिलता है। राज्यपाल शासन में कुछ हद तक स्पोर्ट्स के ढांचे में सुधार हुआ।' - सब इंस्पेक्टर, रशीद अहमद चौधरी, शेर-ए-कश्मीर अवार्ड विजेता