एक दिन से लेकर 10 दिन के कैंप के बाद एडवांस लेवल तक ले जाया जा रहा
मॉडर्न आर्चरी की ट्रेनिंग दे रहे नेशनल लेवल पर धनुर्धरी कर चुके काउंसलर
अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। लद्दाख में धनुर्धरों की फौज तैयार की जा रही है। धनुर्धरी का बेसिक सीखने वाले बच्चों और विभिन्न प्रतियोगिताओं में शिरकत करने वाले धनुर्धरों की संख्या 500 से अधिक ऊपर पहुंच चुकी है। अकेले 90 फीसदी धनुर्धर नुब्रा वैली और साम से निकलकर आ रहे हैं। एक से 10 दिन तक के कैंपों के जरिए बेसिक उपकरण और सैद्धांतिक जानकारी से शुरू कर उन्हें एडवांस लेवल तक ले जाया जा रहा है।
इनमें कई बच्चे सब-जूनियर, जूनियर लेवल पर नेशनल तक खेल चुके हैं। खल्त्से के काउंसलर और नेशनल लेवल तक खेल चुके लोबजांग शेराब की अगुवाई में यह कवायद हो रही है। वे खेलो इंडिया की टैलेंट आइडेंटिफिकेशन जोनल कमेटी के नामित सदस्य भी रहे हैं। लोबजांग बताते है कि लद्दाख में आम तौर पर ट्रेडिशनल यानी पारंपरिक धनुर्धरी होती रही है। जैसे किसी समारोह या धार्मिक अनुष्ठान के वक्त। इसकी कोई गाइडलाइन नहीं होती। इसका पालन परंपरा के तौर पर होता है। लेकिन इन बच्चों को वे मॉडर्न आर्चरी यानी आधुनिक धनुर्धरी की ट्रेनिंग दी जा रही है। उन्हें खेल के नियम-कायदों के साथ ही इस क्षेत्र में करियर के बारे में भी जागरूक किया जा रहा है।
बेसिक इक्विपमेंट की कीमत पांच से 10 हजार...
जम्मू। लोबजांग बताते हैं कि आर्चरी का एक बेसिक इक्विपमेंट करीब पांच से लेकर 10 हजार रुपए के बीच आता है। नए सीखने आए बच्चे को पहले रबर के इक्विपमेंट के जरिए इस खेल की बारीकी बताई जाती है। इसके बाद उसे बेसिक इक्विपमेंट मुहैया कराया जाता है। बकौल लोबजांग वे अपने काउंसलर बजट से इन खिलाड़ियों के लिए उपकरण की खरीद कर रहे हैं।
अच्छे धनुर्धर के लिए मायने रखती है ये क्वालिटी...
जम्मू। अच्छा धनुर्धर बनने के लिए नेत्र दृष्टि बहुत अच्छी होनी चाहिए। साथ ही धनुर्धर को दिमागी रूप से शांत होना चाहिए। तभी वह निशाने पर फोकस कर पाएगा। इसके अतिरिक्त धनुर्धर का कद लंबा होता है तो उसे आर्चरी में फायदा होता है। वो बो को लंबा खींच सकता है, जिससे उसे सटीक निशाना लगाने में मदद मिलती है। हालांकि छोटे कद वाले भी अच्छे धनुर्धर हुए हैं।