- कठुआ के बजोई गांव की बेटी बनीं भारत की नेत्रहीन क्रिकेट टीम की खिलाड़ी
- 11 नवंबर से आयोजित हो रहे विश्व कप में दिखाएंगी प्रतिभा
साहिल खजूरिया
कठुआ। जहां रास्ते धुंधले हों वहां मंजिलें और भी चमकदार लगती हैं। कठुआ के दूरदराज मछेड़ी क्षेत्र के बजोई गांव की बेटी अनेखा देवी ने यह साबित कर दिखाया है। 75 फीसदी दृष्टिहीनता के बावजूद अनेखा अब नेत्रहीनों के क्रिकेट विश्व कप में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगी। अनेखा का परिवार सीमित संसाधनों वाला है। पिता बिजली विभाग में दैनिक वेतनभोगी हैं। परिवार में नेत्रहीनता कोई नई बात नहीं। उनके चाचा और चचेरी बहन भी इसी चुनौती से जूझते रहे हैं लेकिन अनेखा ने इसे अपनी कमजोरी नहीं ताकत बना लिया। चौथी कक्षा तक निजी स्कूल फिर बजोई हाई स्कूल और सातवीं में जम्मू के नेत्रहीन स्कूल में दाखिला लेकर अनेखा के परिवार ने बेटी की शिक्षा को बल दिया।
सातवीं में पहली बार ब्रेल से परिचय हुआ। इससे पहले तक शिक्षक उन्हें आम बच्चों की तरह पढ़ाते थे। चौथी तक तो होमवर्क भी कजन क्लासमेट की मदद से होता था लेकिन अनेखा ने कभी हार नहीं मानी। अब दिल्ली यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में बीए प्रोग्रामिंग कर रही हैं। पढ़ाई के साथ-साथ उन्होंने खुद को खेलों में भी साबित किया।
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जूडो से शुरुआत, क्रिकेट तक का सफर अनेखा के खेलों के साथ सफर की शुरुआत जम्मू के नेत्रहीनों के स्कूल में हुई। सातवीं में जूडो सीखा। अगले छह साल के सफर में पांच नेशनल गोल्ड मेडल और एक कांस्य पदक जीतकर खुद को साबित किया। असली मोड़ तब आया जब 2024 में दिल्ली में नेत्रहीन क्रिकेट कैंप लगा। जम्मू-कश्मीर में लड़कियों की टीम नहीं थी लेकिन चाचा (जेकेसीए महासचिव) ने दिल्ली कैंप की जानकारी दी। दस दिन के प्रशिक्षण ने अनेखा को क्रिकेट से जोड़ दिया। इसके बाद अनेखा ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्होंने 2025 में केरल में पहला नेशनल खेला जिसमें महाराष्ट्र के खिलाफ पांच विकेट लेकर प्लेयर ऑफ द मैच बनीं। बंगलूरू कैंप में प्लेयर ऑफ द सीरीज बनीं और बी2 कैटेगरी में दूसरा स्थान हासिल किया। अब विश्व कप की टीम में उनका नाम शामिल हुआ है। अनेखा ने बताया कि नेत्रहीनों के लिए विश्व कप में सात देशों की टीमें भाग ले रही हैं। अनेखा भारत की ओर से मैदान में उतरेंगी लेकिन सिर्फ गेंद और बल्ले के साथ नहीं, बल्कि पूरे बजोई गांव की उम्मीदों के साथ।
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चुनौतियों से भागो मत, उन्हें अपनाओ
जो लोग घर में रहकर हार मान लेते हैं उन्हें एक बार बाहर निकलकर चुनौती को अपनाना चाहिए। पढ़ाई और खेल सबका अधिकार है। इसने मेरे सपनों को पूरा किया है और हर किसी के सपनों को पूरा करने की क्षमता रखते हैं। चुनौतियों के आगे जीत है।
-अनेखा देवी