जम्मू, दिल्ली समेत कई जगहों पर कश्मीरी पंडित शरणार्थी के रूप में अस्थायी कॉलोनियों में जीवन गुजार रहे हैं। जम्मू-कश्मीर में चुनावों के दौरान हर बार पंडितों के पुनर्वास का मुद्दा उठता है। राज्य में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने जा रहे हैं। ऐसे में यह सवाल फिर से चर्चा में है कि क्या कश्मीरी पंडित घर लौट पाएंगे?
विज्ञापन
'कश्मीर घाटी से हमें निकालने के साथ भारत का संविधान भी वहां से निकाल दिया गया। जब तक वहां संविधान वापस नहीं आता, हम वापस नहीं जाएंगे।' ये शब्द हैं भूषण लाल भट्ट के जो 25 साल से जम्मू में रह रहे हैं। वह कहते हैं कि घाटी के लोगों ने सहअस्तित्व की संस्कृति को त्याग दिया है।
भारत प्रशासित कश्मीर घाटी के एक लाख से अधिक पंडित पिछले 25 वर्ष से जम्मू, दिल्ली और कई अन्य शहरों में शरणार्थी शिविरों में जीवन व्यतीत कर रहे हैं। उन्हें घाटी में हिंसक अलगाववादी आंदोलन शुरू होने के बाद घाटी छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा था। उन्हें वापस लाने की कोशिशें अभी तक सफल नहीं हो सकी हैं।
विज्ञापन
इस मुद्दे पर कोई गंभीर नहीं है
भट्ट की तरह पंडित रोशन लाल भी जम्मू शहर से बाहर पंडितों के लिए बनाई गई एक कॉलोनी में रहते हैं। वो कहते हैं, 'हम 25 वर्ष से अस्थिरता में जीवन गुजार रहे हैं। हमारे पास मकान तो है, लेकिन घर नहीं है। बच्चे बहुत मायूस हैं। जब वह पूछते हैं कि आगे क्या होगा तो हम जवाब देते हैं, मालूम नहीं।'
एक कमरे के छोटे-छोटे मकानों में हजारों पंडित बेबसी में ज़िंदगी के नए मायने तलाश कर रहे हैं। कैम्प में रहने वाली सरिता सिंह कहती हैं, 'बच्चे तो किसी तरह पढ़-लिख गए, लेकिन नौकरी नहीं मिलती। यहां बहुत परेशानी है।' अशोक कौल उन लोगों में से हैं, जिन्होंने हर तरह के खतरे के बावजूद अपना घर नहीं छोड़ा।
अशोक का कहना है कि सरकार पंडितों को वापस लाने के संबंध में गम्भीर नहीं रही है। वो कहते हैं, 'अधिकतर पंडितों ने अपने घर और ज़मीन बेच दी है। वह जाएं तो जाएं कहां। उन्हें पुनः बसाने का काम केवल कागज़ी है। एक-दो जगह कुछ कॉलोनियां बनाई गई हैं, लेकिन उनमें कितने लोग आएंगे।'
लूटमार कत्ल तबाही, कैसे भूलें
श्रीनगर से मिले हुए बडगाम ज़िले में पंडितों के लिए एक बड़ा रिहाइशी कॉम्पलेक्स बनाया गया है। सुनीता रैना यहां चार वर्ष से रह रही हैं। वह कहती हैं कि स्थिति तो बदल गयी है, लेकिन पुरानी यादें जहन में ताजा हैं। रैना कहती हैं, 'यहां इतनी लूटमार हुई, कत्ल हुए, इतनी तबाही मची, उसे कैसे भूलें।
नई नस्ल अब यहां आना नहीं चाहती, पुराने लोगों को अब भी डर है।' रेणु भी यहीं रहती हैं। वह कहती हैं कि इतनी तकलीफें झेलने के बावजूद उनके दिल में किसी के लिए नफरत नहीं है। वो कहती हैं, 'यह तो हमारी मातृभूमि है। ज्यदातर लोग सीधे-सादे हैं। हमें सियासत के दांव-पेंच नहीं मालूम।'
कई अनुमानों के अनुसार 1989-90 में, वादी में पंडितों की तादाद लगभग डेढ़ लाख थी। पंडितों के एक संगठन 'पनुन कश्मीर'(अपना कश्मीर) के मुताबिक यह संख्या इसे बहुत ज्यादा है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक वादी में हिंसक आंदोलन के दौरान 219 पंडित मारे गए थे।
प्रेक्षकों का कहना है कि पंडितों को दोबारा बसाने का मुद्दा किसी पार्टी की प्राथमिकता में शामिल नहीं रहा है। लेकिन, इस बार राज्य के विधानसभा चुनावों में जम्मू के साथ-साथ कश्मीर घाटी की अधिकतर सीटों से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) चुनाव लड़ रही है।
घाटी के लगभग दस निर्वाचन क्षेत्रों में बेघर होने वाले पंडितों के अच्छे-खासे वोट हैं। भाजपा उनका समर्थन हासिल करने की कोशिश कर रही है। प्रेक्षकों का मानना है कि चुनावों में अगर भाजपा का प्रदर्शन अच्छा रहा तो पंडितों की वापसी का रास्ता सरल हो जाएगा।