गांव चन्नी टरगवाल में 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह का समापन
संवाद न्यूज एजेंसी
अखनूर। गांव चन्नी टरगवाल में 21 कुंडीय महायज्ञ सप्ताह में शुक्रवार को मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ में पूर्णाहुति दी गई। इसी के साथ कार्यक्रम का समापन हो गया। अंतिम दिन कथावाचक सुरेश शास्त्री ने कहा कि जीव का स्वरूप परमेश्वर के नित्य दास के रूप में है। इस नियम को भूल जाने के कारण जीव प्रकृति द्वारा बद्ध हो जाता है। लेकिन, परमेश्वर की सेवा करने से वह ईश्वर का मुक्त दास बनता है।
कहा कि जीव का स्वरूप सेवक के रूप में है। उसे माया या परमेश्वर में से किसी एक की सेवा करनी होती है। यदि वह परमेश्वर की सेवा करता है, तो वह अपनी सामान्य स्थिति में रहता है। लेकिन, यदि वह बाह्य शक्ति माया की सेवा करना पसंद करता है, तो वह निश्चित रूप से बंधन में पड़ जाता है। इस भौतिक जगत में जीव मोहवश सेवा कर रहा है। वह काम तथा इच्छाओं से बंधा हुआ है, फिर भी वह अपने को जगत का स्वामी मानता है। यही मोह कहलाता है। मुक्त होने पर मनुष्य का मोह दूर हो जाता है, और वह स्वेच्छा से परमेश्वर की शरण ग्रहण करता है।
उन्होंने कहा कि जीव को फांसने का माया का अंतिम पाश यह धारणा है कि वह ईश्वर है। जीव सोचता है कि अब वह बद्धजीव नहीं रहा, अब तो वह ईश्वर है। वह इतना मूर्ख होता है कि वह यह नहीं सोच पाता कि यदि वह ईश्वर होता तो इतना संशयग्रस्त क्यों रहता। वह इस पर विचार नहीं करता। मोह शब्द अत्यंत महत्वपूर्ण है। मोह ज्ञान का विरोधी होता। वास्तविक ज्ञान तो यह समझना है कि प्रत्येक जीव भगवान का सेवक है। लेकिन, जीव अपने को इस स्थिति में न समझकर सोचता है कि वह सेवक नहीं, अपितु इस जगत का स्वामी है। क्योंकि, वह प्रकृति पर प्रभुत्व जताना चाहता है। यह मोह भगवत कृपा से या शुद्ध भक्त की कृपा से जीता जा सकता है। इस मोह के दूर होने पर मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए राजी हो जाता है।