हुर्रियत नेता सैयद अली शाह गिलानी पासपोर्ट विवाद ने एक बार फिर अलगाववादियों की दोहरी नीति का पर्दाफाश किया है। अलगाववादियों की जमात खुद को आजाद कश्मीर का नागरिक बताती है लेकिन रियासत सरकार से सुविधाएं लेने से भी परहेज नहीं करती।
अलगाववादी खुद को भारतीय नहीं बताते लेकिन भारतीय नागरिक को मिलने वाले पासपोर्ट का हकदार जरूर मानते हैं। गाहे-बगाहे इनकी पाकिस्तान परस्ती भी जगजाहिर होती रहती है लेकिन रियासत सरकार इनकी सुरक्षा पर हर साल लगभग 10 करोड़ रुपये खर्च करती है।
अलगाववादी जब मुख्य धारा में आकर चुनावी सियासत का हिस्सा बनते हैं तो मंत्री की कुर्सी भी आसानी से हासिल हो जाती है। गिलानी के पासपोर्ट आवेदन को फिलहाल केंद्र सरकार ने खारिज कर दिया है। लेकिन, यह केंद्र का स्थायी फैसला नहीं है। डॉ. मनमोहन सिंह की सरकार के दौरान गिलानी को पासपोर्ट दिया जा चुका है।
भाजपा भी करती है अलगाववादियों की खातिर
वर्तमान में केंद्र सरकार ने गिलानी के पासपोर्ट को तकनीकी आधार पर खारिज किया है। आवेदन सही तरीके से भरा नहीं गया था और गिलानी ने खुद को इस आवेदन में भारतीय भी नहीं बताया। अलबत्ता जरूरी शुल्क भी जमा नहीं किए।
इन अनिवार्य औपचारिकताओं की अवहेलना के बावजूद पहले उन्हें पासपोर्ट दिया जा चुका है। अलगाववादियों को मिलने वाली सुरक्षा पर भाजपा पहले सवाल उठाती रही है लेकिन अब रियासत सरकार में शामिल होने के बाद भाजपा का सुर भी नरम हुआ है।
रियासत सरकार अलगाववादियों को दिल्ली जाने पर होटल की सुविधा भी देती रही है। अलगाववादी पाकिस्तानी अधिकारियों से मुलाकात कर भारत विरोधी एजेंडे पर बातचीत करते हैं और उनके दौरे का खर्च रियासत सरकार उठाती है। इन्हें सरकारी खर्च पर इलाज की सुविधा भी हासिल है।
सज्जाद का पासपोर्ट भी रोका गया
सरकार में शामिल होने के बाद भाजपा ने अलगाववादियों को दी जाने वाली इन सुविधाओं पर खामोशी ओढ़ ली है। गठबंधन सरकार की सहभागी पीडीपी ने गिलानी को पासपोर्ट की खुली वकालत शुरू कर दी है।
पीडीपी अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने इस बाबत केंद्र सरकार से संपर्क किया है और अब मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद इस संबंध में केंद्र से बातचीत करने वाले हैं। नेकां के फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला भी गिलानी को पासपोर्ट दिए जाने के पक्ष में हैं।
वर्तमान में रियासत सरकार के कैबिनेट मंत्री सज्जाद लोन का पासपोर्ट भी केंद्र सरकार ने रोक दिया था। यह मामला तीन साल से लंबित है। लोन के पास कोई पासपोर्ट नहीं है।
वह पहले अलगाववादी नेता रह चुके हैं। जम्मू कश्मीर में 5 हजार लोग प्रायर एप्रूवल केटेगरी में शुमार हैं जिन्हें केंद्र सरकार की हरी झंडी के बगैर पासपोर्ट नहीं दिया जा सकता। सभी अलगाववादी नेता इसी सूची में हैं।