- महाराजा रणजीत सिंह के दौर से चलन में है राजस्थान की कला
जम्मू। जम्मू कश्मीर में महाराजा रणजीत सिंह के जमाने से चली आ रही प्रिंटिंग कला में नाबार्ड सहित अन्य वित्तीय संस्थान महिलाओं को स्वरोजगार के लिए आगे बढ़ाने के साथ सहायता भी प्रदान कर रहे हैं। सांबा में नानक चक निवासी ज्योति बाला चार साल से सूती कपड़े में कैलिको प्रिंटिंग के सहारे खुद को आर्थिक रूप से मजबूत कर चुकी हैं।
ज्योति बाला ने बताया कि 2022 में शुरू कैलिको प्रिंटिंग का काम अब बढ़ चुका है। कला को सीखने के बाद 200 अन्य महिलाओं को भी प्रशिक्षित कर स्वरोजगार की तरफ जागरूक किया। नाबार्ड की तरफ से मिली वित्तीय मदद से उन्होंने कैलिको प्रिंटिंग को स्वरोजगार के साथ जोड़ा। इसमें जहां निश्चित आय हो रही है वहीं महिलाओं के दूसरे समूहों के बीच पुरातन कला को आगे बढ़ाने में सहयोग मिल रहा है।
दसोती कपड़े में लकड़ी के ब्लॉक से छापा जाता है डिजाइन
ज्योति ने बताया कि दसोती कपड़ा विशेष तरह का सूती कपड़े की तरह होता है। काफी मोटा दिखने वाले कपड़े में राजस्थान शैली के लकड़ी के ब्लॉक से डिजाइन छापा जाता है। पुरातन प्रिंटिंग कला महाराजा रणजीत सिंह की तरफ से राजस्थान व इससे जुड़े क्षेत्रों से जम्मू कश्मीर में लाई गई। आधुनिक युग में प्रिंटिंग शैली को लेकर लोगों की जागरूकता कम होने से धीरे-धीरे जब लुप्त होने के कगार पर पहुंची तो सरकार ने ध्यान देना शुरू किया।
विभागीय प्रदर्शनी में लगा रहीं स्टाल
ज्योति ने बताया कि उनके सीखकर महिलाएं आज घर से काम कर रही हैं। विभागीय प्रदर्शनी में वह स्टाल लगाकर आर्थिक रूप से मजबूत बन रही हैं। इसी क्रम में रविवार को कन्वेंशन केंद्र में आयोजित सृजन कार्यक्रम में स्टाल लगाया गया। लकड़ी के ब्लॉक बनवाने का खर्च काफी महंगा होता है। राजस्थान के जयपुर में इस पुरातन कला के लोग आज भी कद्रदान हैं। जम्मू में भी अब लकड़ी के ब्लॉक बनने लगे हैं। दसोती कपड़े में छापी गई कैलिको प्रिंटिंग के कारण उत्पाद महंगे जरूर होते हैं लेकिन काफी टिकाऊ हैं। प्रमुख रूप से रूमाल, मेजपोश, पर्दे, चादर मांग में रहते हैं।