ग्राउंड रिपोर्ट
मोटा धान बोए हों तो ही जाएं सरकारी क्रय केंद्र, बाकी किस्मों की न मांग न दाम
14221 हेक्टेयर धान की खेती होती है, इसमें 2000 हेक्टेयर ही मोटे धान का रकबा
इसमें भी बमुश्किल 25 फीसदी ही सरकारी केंद्रों पर खरीदा जा रहा मोटा धान
सांबा। सांबा जिले में दो धान खरीद केंद्र खोले गए हैं, जिनमें राजपुरा और रामगढ़ क्षेत्र शामिल हैं, लेकिन इन केंद्रों पर सिर्फ मोटा धान परमल की ही खरीद की जा रही है। हैरत की बात यह है कि मोटे धान की खेती सिर्फ 2000 हेक्टेयर में ही होती है और उसमें भी उपज का बमुश्किल 25 फीसदी ही सरकारी खरीद होती है। इस नियम के चलते धान की अन्य किस्में लगाने वाले किसानों को इसका लाभ नहीं मिल रहा है। किसान निजी व्यापारियों के रहमों - करम पर निर्भर होकर रह गए हैं।
परमल के अलावा अन्य किस्म के धान किसान सरकारी क्रय केंद्रों पर नहीं बेच पा रहे हैं, क्योंकि सरकार सिर्फ मोटा धान ही खरीद रही है। किसान सुरेंद्र कुमार और राकेश कुमार का कहना है कि ऐसे सरकारी क्रय केंद्रों का बहुत कम किसानों को लाभ मिल पा रहा है। उनके अनुसार, अधिकतर किसान बासमती धान की किस्म ही लगा रहे हैं, काफी कम किसान परमल लगाते हैं। उनका कहना है कि सरकारी क्रय केंद्र आम किसानों के लिए लाभकारी नहीं। उन्हें केवल खाना पूरी के लिए ही खोला जा रहा है।
14221 हेक्टेयर में होती है धान की खेती -
सांबा जिले में 14221 हेक्टेयर पर धान की खेती होती है, जिसमें केवल 2000 हेक्टेयर में ही परमल (मोटा धान) लगाया जाता है। इसमें भी मात्र 25 प्रतिशत धान ही सरकारी क्रय केंद्रों पर खरीदा जाता है। बाकी व्यापारी ही खरीद रहे हैं। इससे किसानों को पूरा दाम नहीं मिल पा रहा है।
किसान खेत से ही व्यापारियों और आढ़तियों को बेच देते हैं, क्योंकि उनका मंडी में ले जाने का समय और खर्च बच जाता है। किसानों को सरकारी खरीद केंद्रों के नियम कायदे रास नहीं आते। वहां कभी नमी के नाम पर तो कभी गुणवत्ता के नाम पर आए दिन खोट निकाले जाने के कारण वे सौ दो सौ रुपये कम रेट पर खेत से ही व्यापारियों के हाथ बेचना अधिक सुविधाजनक समझते हैं।
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सांबा के गल्ला व्यापारी जगदीश कुमार का कहना है कि व्यापारी किसानों से उनकी रजामंदी पर ही धान खरीदते हैं। पंजाब में बासमती धान की मंडी लगती हैं। जम्मू कश्मीर में केवल मोटा धान ही क्रय केंद्र पर आता है। धान की अन्य किस्मों को राइस मिल मालिक और व्यापारी ही खरीदते हैं। किसान भी यह सोच कर व्यापारी को बेचना अधिक मुनासिब समझते हैं कि उनका मंडी में आने जाने का खर्च बच जाता है। व्यापारी किसानों के घर जाकर सम्मानपूर्वक उनका अनाज भी खरीदते हैं और उचित दाम भी देते हैं। दूसरी ओर सरकारी क्रय केंद्रों पर धान की सफाई के नाम पर 50 रुपये प्रति क्विंटल के हिसाब से कटौती कर ली जाती है।
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- सरकारी धान खरीद मंडियों के खुलने से किसानों को लाभ तो मिल रहा है लेकिन सिर्फ उन्हें जिन्होंने केवल मोटा धान लगाया है। अन्य किस्में लगाने वाले किसान आज भी व्यापारियों के रहमों करम पर निर्भर हैं।
- किसानों का कहना है कि सरकार को अन्य किस्म के धान की खरीद के लिए भी अलग क्रय केंद्र खोलने चाहिए, ताकि किसानों को पूरा लाभ मिल सके।
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सरकार की और से धान खरीद केंद्र इसलिए खोले गए हैं ताकि किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिल सके। पहले परमल के दाम व्यापारी मन मर्जी से किसानों को देते थे। कोई 1800 में खरीदता था तो कोई 2000 प्रति क्विंटल का रेट देता था। , सरकारी धान खरीद केंद्र खुलने से किसानों को लाभ मिलने लगा है। जो व्यापारी खेत से उठाते है उन्हें भी सरकारी रेट ही किसान को देना होता है।
राकेश खजुरिया,
जिला मुख्य कृषि अधिकारी सांबा।