डुग्गर संस्कृति में विशेष महत्व रखने वाला संकट चतुर्थी और भुग्गा व्रत इस वर्ष 24 जनवरी को होगा। बच्चों की मंगलकामना और ग्रहों की शांति के लिए इसमें भगवान श्रीगणेश जी की उपासना की जाती है। इस व्रत को संकट चौथ, गणेश चतुर्थी, तिलकूट चतुर्थी, संकटा चौथ आदि नाम से जाना जाता है। इस वर्ष महिलाएं इस व्रत का उद्यापन यानी मोख कर सकती हैं। गत वर्ष भुग्गे का मोख नहीं हो सका था।
भुग्गा व्रत के दौरान महिलाएं नहा धोकर सबसे पहले श्रीगणेश जी की मूर्ति को पंचामृत से स्नान कराने के बाद फल, लाल फूल, अक्षत, रोली, मौली, दूर्वा अर्पित करें। तिल से बनी वस्तुओं अथवा तिल और गुड़ से बने भुग्गे का प्रसाद चढ़ाया जाता है। चंद्रोदय जम्मू में रात्रि 9 बज कर 42 मिनट पर होगा। इसके बाद व्रतधारी महिलाएं रात को चांद को अर्घ्य देकर श्रद्धापूर्वक बच्चों के नाम का भुग्गा निकालकर अलग रखती हैं।
इसके साथ मूली, गन्ना भी रखा जाता है। बाद में कुल पुरोहित व कन्याओं में इसे बांटा जाता है। इसके बाद महिलाएं व्रत खोलती हैं। संकट चौथ के दिन 108 बार गणेश मंत्र श्री गणेशाय नम: का जाप करना शुभ भलदायी होता है। व्रत निराहार किया जाता है। पानी का सेवन भी नहीं किया जाता।
श्री कैलख ज्योतिष एवं वैदिक संस्थान के अध्यक्ष महंत रोहित शास्त्री के अनुसार घर में भुग्गा पीसकर बनाना शगुन समझा जाता है। डुग्गर संस्कृति में विशेष महत्व रखने वाला भुग्गे का व्रत मौसम के बदलाव से जुड़ा हुआ है। डुग्गर समाज में ऐसी मान्यता है कि भुग्गे के व्रत के साथ ही सर्दी में कमी शुरू हो जाती है।