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बेटे की करनी का पिता को दंड: नाबालिग की गाड़ी से हुआ सड़क हादसा, कोर्ट ने सुनाई कुछ ऐसी सजा

Wed, 01 Dec 2021 11:04 PM IST
प्रशांत कुमार संवाद न्यूज एजेंसी, श्रीनगर।

सार

फैसला सुनाने के बाद अदालत ने फैसले का आदेश शिक्षा विभाग के आयुक्त सचिव को भी भेजा है। निर्देश दिया है कि बेटे की करनी पर पिता को सजा के आदेश से बच्चों और उनके अभिभावकों को जागरूक किया जाए।
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कोर्ट (प्रतीकात्मक तस्वीर।) - फोटो : iStock
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विस्तार
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नाबालिग बेटे ने मोटर गाड़ी चलाकर सड़क हादसे को अंजाम दिया। कोर्ट ने पिता को इसका जिम्मेवार ठहराकर 25 हजार रुपये जुर्माने के साथ तीन साल की जेल की सजा सुना दी। श्रीनगर के विशेष मोबाइल मजिस्ट्रेट यातायात शब्बीर अहमद मलिक ने सजा सुनाकर फैसले का आदेश शिक्षा विभाग के आयुक्त सचिव को भी भेजा है। साथ ही कहा है कि बेटे की करनी पर पिता को सजा का यह आदेश तमाम स्कूलों में साझा कर बच्चों और उनके अभिभावकों को जागरूक किया जाए। वहीं, कोर्ट ने दोषी पिता की मनुहार और उसका पिछला रिकॉर्ड देखकर सजा पर एक साल का प्रोबेशन दे दिया। प्रोबेशन के तहत दोषी को 30 हजार रुपये का बॉंड भरना होगा। दोषी को एक वर्ष तक शांति और अच्छे व्यवहार को साबित करना होगा, अन्यथा तीन साल जेल की सजा भुगतनी होगी।

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कोर्ट ने कहा कि मोटर व्हीकल एक्ट 1988 की धारा 199-ए में स्पष्ट है कि मोटर गाड़ी से यदि नाबालिग किसी हादसे को अंजाम देता है या फिर गाड़ी चलाते पकड़ा जाता है तो इसके लिए नाबालिग नहीं बल्कि उसका गार्जियन या अभिभावक जिम्मेवार होंगे। इसी आधार पर इस मामले में नाबालिग बेटे के पिता को दोषी मानते हुए तीन साल के सामान्य कारावास की सजा सुनाई जाती है।
 

बाइक-स्कूटी चलाते नजर आते हैं नाबालिग

कोर्ट ने कहा कि नाबालिग जहां तहां स्कूटी, बाइक चलाते नजर आते हैं। ट्रैफिक सिगनल हो या फिर पुलिस नाका, यह नाबालिग किसी अन्य वाहन की आड़ लेकर भागते नजर आते हैं। ऐसे में इन्हें रोकना इनकी जान को जोखिम में डालता है। यह अपनी जान के लिए खतरा तो होते ही हैं, अन्य चालकों की जान को भी जोखिम में डाल देते हैं। अभिभावकों को देखना होगा कि किसी भी सूरत में उनके बच्चे इस जोखिम को न उठाएं।

 
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तीन साल में 3.92 लाख मौतें

अदालत ने कहा कि क्राइम इंडिया रिपोर्ट के अनुसार देश भर में सड़क हादसों में पिछले तीन वर्ष में 3.92 लाख लोगों की मौत हुई है। वर्ष 2020 में ही 1.20 लाख लोगों ने जान गंवाई है। यह आम नागरिकों और समाज को देखना होगा कि यातायात नियमों का पूरी तरह से पालन किया जा रहा है। पुलिस या सरकारी एजेंसियों के पास इतना अमला या व्यवस्था नहीं है कि वह एक-एक नागरिक से यातायात नियमों का पालन करवाए।
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