जम्मू। अभिभावकों की अपने बच्चों से अधिक अपेक्षाएं उन्हें डिप्रेशन में डाल रही हैं। दसवीं के परीक्षा परिणामों के बाद संभाग में किशोरों में आत्महत्या के मामले बढ़े हैं। पिछले 36 घंटों में अलग-अलग स्थानों पर दो किशोर आत्महत्या कर चुके हैं। मनोचिकित्सकों के अनुसार ऐसे मामलों में अभिभावक अपने बच्चों की तुलना अधिक क्षमता वाले बच्चों से कर रहे हैं, जिससे वे तनाव में आकर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो रहे हैं। ऐसे बच्चों को परिवार, स्कूल और सामाजिक स्तर पर समर्थन नहीं मिलता है।
मनोचिकित्सक डा. जगदीश थापा के अनुसार कम क्षमताओं वाले बच्चों को अभिभावक उन्हें असफल होने वाले मौकों का सामना करने के लिए तैयार नहीं करते हैं। उन्हें प्रेरित करने के बजाय उन पर अच्छे परिणामों को लेकर दबाव बनाया जाता है। यही स्थिति स्कूल में शिक्षकों और सामाजिक स्तर पर रहती है। क्षमताओं में कमजोर ऐसे बच्चे धीरे धीरे तनाव से ग्रस्त हो जाते हैं और विपरीत नतीजे आने पर डिप्रेशन में चले जाते हैं। इनमें कई बच्चों का नतीजे मिलने की सूचना रोना, घबराहट, चिल्लाना, हाथ पांव फूलने जैसे लक्षण रहते हैं।
मानसिक स्तर पर कमजोर बच्चे भारी तनाव में चले जाते हैं और यह परिस्थितियां उनके लिए घातक होती हैं। भारतीय शोधों में पाया गया है कि देश में 52 प्रकार के मौकों में एक परीक्षा परिणामों में असल होना है, जिसमें पीड़ित डिप्रेशन में जाकर आत्महत्या जैसा रास्ता चुन लेता है। इन मामलों में शहरी इलाकों के विद्यार्थी ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इसका मुख्य कारण यहां हर स्तर पर प्रतिस्पर्धा ज्यादा होना है।
लाडलों को तनाव से ऐसे बचाएं
1. परीक्षा परिणामों में उन्हें डांट के बजाय भविष्य में सफलता के लिए प्रेरित करें
2. असफल परिणामों के बाद बच्चों के व्यवहार पर बारीकी से नजर रखें कि वे तनाव में तो नहीं हैं
3. पारिवारिक, स्कूल और सामाजिक स्तर पर कमजोर बच्चों को पूरा समर्थन दें
4. ऐसे बच्चों को अकेला न छोड़ें और उनसे नियमित संवाद करके उनके परेशानी जाने
5. असफल होने पर बच्चों से हीन भावना न करें