बुजुर्ग बोले - पारंपरिक त्योहार का बदला स्वरूप
संवाद न्यूज एजेंसी
सांबा। लोहड़ी पर पहले पारंपरिक लोक गीत गाए जाते थे। अब डीजे बज रहा है। बुजुर्गों ने कहा कि धीरे-धीरे पारंपरिक त्योहार का स्वरूप बदलता जा रहा है। पहले एक साथ मिलकर लोहड़ी मनाई जाती है।
दुकानदार कमल भट्टी कहते हैं कि पहले कस्बे के लिंक मार्ग बाजार के दुकानदार लकड़ियां एकत्र कर एक स्थान पर लोहड़ी दहन करते थे। अब यह प्रथा लुप्त हो गई है। रामनगर के पूर्व सरपंच कृष्ण चंद कहते हैं कि पहले गावों के लोग चौक-चौराहों पर लकड़ी जमा करते थे। एक ही स्थान पर अर्घ्य देते थे। आज अपने-अपने घरों में ही पर्व मना रहे हैं। रंधवाल निवासी राम पाल शर्मा कहते हैं कि वे लोग लोहड़ी के लिए कई दिन पहले ही तैयारियां शुरू कर देते थे। बेटे की शादी के बाद गांव में लोहड़ी बांटी जाती थी। नवजात की भी लोहड़ी बांटी जाती थी। मोहल्ले की महिलाएं घर-घर जाकर लोहड़ी बांटती थीं। आज काफी हद तक कम रौनक देखने को मिलती है।