जम्मू। जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट की ने सोमवार को सरकार के ओर से पच्चीस पुस्तकों को जब्त करने के आदेश के खिलाफ दायर याचिकाओं पर किसी भी तरह की अंतरिम राहत देने से इनकार कर दिया। अदालत ने मामले को जटिल बताते हुए सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। मुख्य न्यायाधीश अरुण पल्ली, न्यायमूर्ति रजनीश ओसवाल और न्यायमूर्ति शहजाद अजीम की पीठ ने यह आदेश सुनाया।
पीठ ने इस विषय पर दायर एक जनहित याचिका को भी खारिज कर दिया और टिप्पणी की कि 90 प्रतिशत लोग इस मुद्दे को समझ भी नहीं पाएंगे। अदालत ने कहा कि यह मामला जनहित याचिका के दायरे में नहीं आता है। इन याचिकाओं को सेवानिवृत्त वायु उप अधीक्षक कपिल काक, लेखिका सुमंत्रा बोस, शांति विशेषज्ञ राधा कुमार और पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त वजाहत हबीबुल्ला ने दायर किया था। उनका कहना है कि सरकार का आदेश बिना ठोस कारणों के जारी किया गया है और इसमें किसी भी किताब के विवादित हिस्सों का जिक्र नहीं किया गया है। उन्होंने उच्चतम न्यायालय के पुराने फैसलों का हवाला देते हुए इसे मनमाना और असंवैधानिक बताया।
सरकार ने अपने पक्ष में कहा कि इस तरह का साहित्य युवाओं में कट्टरता फैलाने, आतंकवाद को बढ़ावा देने, सुरक्षाबलों को बदनाम करने, ऐतिहासिक तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और अलगाव को बढ़ाने का जरिया बना हुआ है। जब्त की गई पुस्तकों में कई चर्चित लेखकों के नाम शामिल हैं जिनमें सुमंत्रा बोस, एजी नूरानी, अरुंधति रॉय, सीमा काजी, हफ्सा कंजवाल और विक्टोरिया स्कोफील्ड जैसे नाम प्रमुख हैं। इनमें से कई पुस्तकें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रसिद्ध प्रकाशन संस्थानों द्वारा प्रकाशित की गई हैं। अब अदालत अगली सुनवाई में सरकार का जवाब सुनकर आगे की कार्रवाई तय करेगी।