इसके बाद नेकां ने कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई और 1987 में विधानसभा चुनाव दोनों पार्टियों ने मिलकर लड़ा। इसके बाद शाह गुट खत्म हो गया। नेकां-कांग्रेस गठबंधन की सरकार फिर से सत्ता पर काबिज हो गई। अब फिर नेकां उसी दौर से गुजर रही है। इस बार मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला हैं। हालांकि पार्टी से विद्रोह करने वाले विधायकों की तादाद 25 से ज्यादा बताई जा रही है।
विधायकों ने मंत्रिमंडल पुनर्गठन के बाद विरोध दर्ज किया है। सरकार के सभी पुराने मंत्रियों को हटाकर नए नेताओं को मौका देने, उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी से पीडब्ल्यूडी वापस लेने, मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर असलम वानी को हटाने और चुनावी घोषणापत्र के वादों को पूरा करने सहित अन्य मांगों से जुड़ा पत्र सौंपा है। जवाब में प्रदेश सरकार या संगठन ने कोई फैसला नहीं लिया है। सूत्रों के अनुसार नेकां का शीर्ष नेतृत्व चार नवंबर को होने वाली मुबाकर गुल की प्रेस कॉन्फ्रेंस पर नजर बनाए हुए है। इसके बाद पार्टी पत्ते खोल सकती है। पार्टी से जुड़े सूत्र बताते हैं कि नेकां 1984 की तर्ज पर ही इस बार भी हालात भांप रही है। इसे देखते हुए आगामी कदम उठाए जाएंगे।
विधायकों की नाराजगी को दूर करने के संबंध में कोई भी फैसला पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को लेना है। विधायकों ने जो भी शिकायतें की हैं उन पर विचार के बाद सही समय आने पर पार्टी प्रमुख बात रखेंगे। पार्टी शीर्ष नेतृत्व पूरे हालात पर नजर बनाए हुए है। -सुरिंदर चौधरी, उपमुख्यमंत्री
विधायक न तो पार्टी के खिलाफ और न ही बागी हैं। उनकी कुछ मांगें हैं, जिन्हें उन्होंने शीर्ष नेतृत्व के समक्ष रखा है। विधायकों ने कहा है कि वे पार्टी नहीं, बल्कि समस्याओं के खिलाफ हैं। नेकां का आंतरिक और परिवार के भीतर का मामला है। -अल्ताफ अहमद कालू, ग्रामीण विकास मंत्री