रियासी। श्री सनातन धर्म सभा के हाल में जारी शिवमहा पुराण कथा में शुक्रवार को सूरज कौशल ने कहा कि कामदेव को लेकर भगवान विष्णु व नारद में हुई बहस के बाद विष्णु जी ने नारद का अभिमान भंग करने की सोची।
नारद जब स्वर्ग की तरफ जा रहे थे तो रास्ते में एक नगर का निर्माण करवा उसके राजा का नाम शीलनिधि रखा। नारद ने देखा कि वहां पर स्वयंवर चल रहा है और कई स्थानों से राजा आए हैं। उत्सुक नारद वहां पर गए तो राजा ने उनका भव्य स्वागत किया। नारद से पुत्री का ज्योतिष भविष्य जाना लेकिन मन ही मन वह कन्या को चाहने लगे। उन्होंने राजा को कहा कि उनकी कन्या लक्ष्मी स्वरूप है। उसका विवाह त्रिलोकी के स्वामी भगवान शिव के साथ होना चाहिए।
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यह कह कर वहां से वह चले गए। रास्ते में नारद ने सोचा कि इतनी सुंदर कन्या का विवाह उनके साथ होना चाहिए। शकल को ले पसोपेश की स्थिति में नारद भगवान विष्णु के पास गए और उसे उन जैसा मुख मांगा। विष्णु समझ गए कि नारद कामदेव की माया में फंस गए हैं। वह उन्हें बानर मुख प्रदान करते हैं।
नारद स्वयंवर में जाते हैं जहां पर उनकी हंसी उड़ाई जाती है। क्रोधित नारद भगवान विष्णु को श्राप देने पहुंचते हैं वहां पर उन्हें अपनी गलती का अहसास होने पर वह माफी मांगते हैं। सूरज कौशल ने कहा कि जब भगवान भी कामदेव की माया व अन्य मोह से नहीं बच सके तो फिर आज का मनुष्य कैसे बचेगा। वह तो इसमें धंसता जा रहा है। आरती के साथ कथा का समापन हुआ व प्रसाद बांटा गया।