रश्मि शर्मा के पूर्वज पास के ही बिश्नाह में आजादी के पहले से रह रहे हैं, लेकिन उनके बेटे को जम्मू-कश्मीर का स्थायी निवास प्रमाण पत्र नहीं मिल पाया।
नतीजतन उनका पुत्र विशाल शर्मा अब प्रधानमंत्री स्कालरशिप के लिए फार्म नहीं भर पाएगा। इंजीनियर बनने का सपना बिखर गया। दरअसल संविधान में बाद में जोड़े गए अनुच्छेद 35 कैपिटल ए की वजह से महिलाओं के मौलिक अधिकारों पर भी कैंची चली।
इसी तरह वाल्मीकि समाज और गोरखों की तीन पीढ़ियां खप गईं, लेकिन उन्हें हक हासिल नहीं हो सका है। गोरखों की बहादुरी से प्रभावित होकर महाराजा रणजीत सिंह ने 1814 में नेपाल से गोरखों की अपनी सेना में भर्ती की थी।
बाद में गोरखे जम्मू-कश्मीर के महाराजा की सेना के अंग बने। महाराजा ने उन्हें बसने के लिए जमीन भी दी। कर्नल रिटायर्ड राजेंद्र सिंह का दर्द है कि उन्होंने अपनी जीवन भर की कमाई से जम्मू के गरोखानगर में घर तो बनाया, लेकिन मकान उनके नाम नहीं हो पा रहा है।
उन्हें आज तक जम्मू-कश्मीर के स्थायी निवासी होने का प्रमाण पत्र नहीं मिला। वह दफ्तरों का चक्कर काटते रहे। गोरखानगर के शेर बहादुर राणा, करुणा क्षत्रिय, दुर्गा सिंह अधिकारी, वीरेंद्र सिंह प्रधान, धर्म बहादुर सबका दर्द एक जैसा है।
पूर्वजों के बलिदान के बाद गोरखा समाज के ये लोग जम्मू-कश्मीर की सुरक्षा में जुटे हैं, लेकिन इनके बच्चों के लिए नौकरियों के दरबार बंद हैं। उच्च शिक्षा मुमकिन नहीं है।