जीएमसी में सफाई व्यवस्था बेहाल है। अस्पताल के पंद्रह वार्डों सहित अन्य 35 जगह पर मरीजों को इलाज दिया जा रहा है। अस्पताल से रोजाना जनरल और इन्फेक्शन वेस्ट निकल रही है। इस वेस्ट को डस्टबीन में डाला जाता है, लेकिन अस्पताल में कहीं भी डस्टबीन में प्रोटेक्शन पालीथिन नहीं डाला गया है, जिससे खुले में डस्टबीन लगाकार संक्रमण फैला रहे हैं।
यही हाल अस्पताल के बाहर है। डाक्टर पार्किंग, चोपड़ा नर्सिंग के सामने पार्क सहित अन्य क्षेत्रों में गंदगी के ढेर अस्पताल की सुंदरता पर ग्रहण लगा रहे हैं। जीएमसी के अधीक्षक डा. रविंद्र रतनपाल का कहना है कि डस्टबीन में प्रोटेक्शन पालीथिन डालने के लिए काम किया जा रहा है।
अस्पताल के विभिन्न जनरल वार्डों, आईसीयू, सीसीयू, इमरजेंसी, आपरेशन थियेटर सहित अन्य महत्वपूर्ण स्थानों पर जनरल वेस्ट के लिए डस्टबीन में जनरल वेस्ट के लिए काले पालीथिन, इन्फेक्शन युक्त वेस्ट के लिए पीले, शार्क और प्लास्टिक डिस्पोजल वेस्ट (ब्लेड, शीशे आदि) के लिए नीले पालीथिन का प्रयोग किया जाता है, लेकिन अस्पताल में खुले डस्टबीन संक्रमण फैलाने का काम कर रहे हैं।
नाकाफी है 100 किलोग्राम इंसिलेटर
जीएमसी के हालत यह है कि डस्टबीन के पास गुजरना भी दुश्वार होता है। इन पालीथिन से पूरी वेस्ट को बेहतर ढंग से उठाकर नष्ट किया जाता है, लेकिन जीएमसी में हालात इसके विपरीत हैं। यह अव्यवस्था काफी समय से बनी हुई है, लेकिन किसी ने भी सफाई पर गौर नहीं किया है।
हालांकि अस्पताल में संक्रमित वेस्ट को 100 किलोग्राम इंसिलेटर से नष्ट किया जाता है, लेकिन यह नाकाफी है। जीएमसी से निकलने वाली जनरल वेस्ट में कागज, लिफाफे और इन्फेक्शन वेस्ट में उपयोग हुई सुई, पट्टियां और अन्य प्रकार की उपयोग हुई दवाइयां शामिल होती हैं।
स्वास्थ्य और चिकित्सा शिक्षा विभाग में करीब 6000 बेडों से रोजाना वेस्ट निकल रहा है, जबकि अलग से नए ब्लाक भी शामिल हैं। शहर के अस्पतालों में प्रतिदिन प्रति एक बेड से दो किलो के करीब बायो मेडिकल वेस्ट निकलती है। सरकारी अस्पतालों में से 80 प्रतिशत में जनरल और 15-20 प्रतिशत में इन्फेक्शन वेस्ट शामिल होती है।