कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय सेना ने भारत-पाकिस्तान अंतरराष्ट्रीय सीमा के करीब क्षेत्र में बारूदी सुरंगाें का जाल बिछाया गया था, ताकि दुश्मन को आगे बढ़ने से रोका जा सके। युद्ध के बाद वहीं बारूदी सुरंगें ग्रामीणों की जान के दुश्मन बन गए।
सीमावर्ती क्षेत्र के कई ऐसे युवक हैं, जो इनकी चपेट में आने अपनी टांगें गंवा चुके हैं। वहीं राज्य सरकार ने उनकी सुध तक नहीं ली। मदद के नाम पर दो या तीन सौ रुपये मासिकपेंशन देकर आंसू जरूर पोंछने के प्रयास किए। आज उनकी दिक्कतें बढ़ गई हैं।
सीमावर्ती गांव वैनगलाड के युवक सुनील कुमार ने कहा कि एक मार्च 2003 को वह खेत की ओर जा रहा थे कि बारूदी सुरंग की चपेट में आ गए थे, जिससे एक पैर गंवानी पड़ी। चक फकीरा गांव के सुरिन्द्र कुमार ने कहा कि 11 नवंबर 2002 को वह गांव जा रहे थे कि रास्ते में बारूदी सुरंग की चपेट में आ गए। उन्हें भी एक टांग गंवानी पड़ी।
वर्ष 2003 में छिंकी गांव के पवन कुमार तब चपेट में आए जब वह शौच के लिए गए। प्रभावितों के अनुसार राज्य सरकार की ओर से कोई सहायता नहीं की गई। केवल दो-तीन सौ रुपये मासिक पेंशन देकर आंसू पोंछने के प्रयास किए गए। जिला प्रशासन एवं राज्य सरकार की ओर से कोई सुनवाई नहीं की जा रही। वर्तमान में अपंग जिंदगी व्यतीत कर रहे।