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घाटी के दलों में लगी पाक से बातचीत शुरू कराने की होड़

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सीमा पर गोलाबारी के बीच जहां हजारों लोग विस्थापन का दंश झेल रहे हैं, अपने देश में ही लोग शरणार्थी बन कर रह गए हैं वहीं राजनीतिक दलों ने इस संवेदनशील मुद्दे पर भी रोटियां सेंकनी शुरू कर दी है।
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आलम ये है कि भारत द्वारा पाकिस्तान के साथ रद की गई सचिव स्तर की वार्ता को शुरू कराने के लिए घाटी के क्षेत्रीय दलों में होड़ लग गई है। इसी होड़ का परिणाम रहा कि एक दिन पूर्व जम्मू कश्मीर में इस आशय का प्रस्ताव भी आम सहमति से पास हो गया। जिसमें भारत सरकार से पाकिस्तान से बातचीत दोबारा शुरू करने की मांग की गई है।

अब हर कोई पाक से बातचीत बंद करने के लिए केन्द्र सरकार को कोसने में लगा है। वो बात अलग है कि देश की जनता या अन्य राजनीतिक दल बिना फायरिंग रोके पाक से बातचीत करने के पक्ष में नहीं हैं।
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फायरिंग से विस्‍थापित भी बातचीत के पक्ष में नहीं

माना जाता है कि जम्‍मू ‌कश्मीर की आम जनता भी बिना बार्डर पर फायरिंग रोके और मामले में कोई कार्रवाई हुए पाक से रद हुई बातचीत दोबारा शुरू करने के पक्ष में नहीं है।

बल्कि लोग खुलकर पाक पर कड़ी कार्रवाई की मांग भी करने लगे हैं। यहां तक की फायरिंग के चलते बार्डर से विस्‍थापित हुए लोग भी पाक से किसी तरह की बातचीत नहीं चाहते। इनका साफ कहना है कि जब पाक सीमा पर लगातार गोले पर गोले बरसा रहा है तो उससे क्या बात की जाए।

अब लोग यह भी कहने लगे हैं कि पाक बातचीत की भाषा समझता ही नहीं है। बावजूद इसके नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी जैसे घाटी के दल इससे अलग रवैया अख्तियार किए हुए हैं।

नेशनल कान्फ्रेंस और पीडीपी में लगी होड़

इसके लिए बकायदा विधानसभा और विधानपरिषद में प्रस्ताव भी लाया गया। जिसमें केन्द्र सरकार से दोबारा पाक से बातचीत शुरू करने की मांग की गई।

इस मुद्दे को लेकर सत्तारुढ नेशनल कान्फ्रेंस और मुख्य विपक्षी दल पीडीपी में होड़ का आलम ये रहा कि जब नेशनल कान्फ्रेंस के एमएलसी देवेन्द्र राणा ने इस प्रस्ताव को विधानपरिषद में रखा तो विपक्षी पीडीपी ने इसका जोरदार विरोध किया, वो इसलिए नहीं कि वह इसके पक्ष में नहीं थी।

बल्कि पीडीपी की आपत्ति इस बात पर थी कि अकेले नेशनल कान्फ्रेंस इसका श्रेय लेने की फिराक में है, ‌इसलिए पीडीपी की तरफ से प्रस्ताव दिया गया कि यह प्रस्ताव सदन की तरफ से रखा जाए। बदकिस्मती से इसे मान भी लिया गया और पास भी कर दिया गया।

विरोध को दरकिनार कर पाक से बातचीत का प्रस्ताव पास

लेकिन सवाल यह है कि कि जब पूरा देश पाक से बातचीत के विरोध में है तब इन क्षेत्रीय दलों में पाक से बातचीत शुरू करने की होड़ क्यों हैं। राजनीति के जानकारों की मानें तो इस प्रस्ताव के पीछे दोनों दलों की मंशा स्‍थानीय वोटबैंक की राजनीति है।

खासकर कश्मीर क्षेत्र के लोगों को लुभाने के लिए दोनों दल इस तरह का पासा फेंक रहे हैं। पीडीपी की अध्यक्षा महबूबा मुफ्ती तो खुलकर इसके लिए केन्द्र सरकार को कोसती हैं और जल्द से जल्द बातचीत शुरू करने की मांग करती हैं।

बकौल महबूबा केन्द्र सरकार के बातचीत रद करने की वजह से ही कश्मीर समस्या का हल नहीं निकल रहा है। हैरत की बात यह है ‌कि पीडीपी और एनसी की इस मंशा का जहां भारतीय जनता पार्टी और पैंथर्स पार्टी जैसे दल खुलकर विरोध कर रहे हैं वहीं कांग्रेस इस पर चुप्पी साधे है।
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पिछले 25 सालों से बातचीत का क्या हल निकला

कमाल की बात यह है कि इस प्रस्ताव को पास करते समय इस बात का भी ध्यान नहीं रखा गया कि विदेश और रक्षा नीति जैसे महत्वपूर्ण मामलों में राज्य सरकार को दखल देने का कोई अधिकार नहीं है। न ही राज्य सरकार केन्द्र को इस मामले में कोई सलाह दे सकती है।

रक्षा और विदेश मामलों के प्रमुख जानकार मारुफ रजा भी प्रदेश सरकार की इस मंशा पर सवाल खड़ा करते हैं। उनके अनुसार न पाक के हालात ऐसे हैं कि उससे बातचीत की जाए न उसकी मंशा ऐसी है कि बातचीत करके कोई हल निकाला जा सके। वहीं वह एक बड़ा सवाल भी खड़ा करते हैं कि पिछले 25 सालों से पाकिस्तान से बातचीत ही तो की जा रही है हल क्या निकला?
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