जम्मू। शाही डोगरा पैलेस या मुबारकमंडी के बहुत करीब पक्का डंगा बाजार एक तरफ मोती बाजार से शुरू होता है और दूसरी तरफ दीवान मंदिर जंक्शन और चौक चबूतरा पर समाप्त हो जाता है। एक किलोमीटर से भी कम के दायरे में बसे इस बाजार में एक छोटी सी किताबों की दुनिया बसती है। इस बाजार ने वो दौर भी देखा है जब ये कहा जाता था कि जो किताब कहीं न मिले, उसे लेने पक्का डंगा चले जाओ, वहां मिलेगी ही।यहां के निवासियों का दावा है कि डोगरी में लिखी रामायण कहीं-किसी लाइब्रेरी में नहीं मिलेगी, पर यहां के जिल्दसाज ने उसे सहेज कर अपने कंप्यूटर में रखा है। कारोबारी कहते हैं कि जिस बाजार को हमारे पुरखों ने बसाया, इसे पहचान दी थी, उस बाजार को अव्यवस्थित विकास खा गया। पुस्तकें पढ़ने में यूं भी लोगों की रुचि खत्म हो गई, रही सही कसर पायरेसी ने पूरी कर दी। वहीं सड़कों को फुटपाथ ने निगल लिया है। इस कारण सड़कों पर वाहन खड़े करने की जगह बची नहीं और जाम नासूर बन गया है।
कच्चा से पक्का हुआ और कहलाया पक्का डंगा
स्थानीय कारोबारी कहते हैं कि पक्का डंगा का अर्थ है ऊंचा पक्का मंच, जहां आसपास के इलाकों के लोग सुबह और शाम तक पुराने पीपल के पेड़ के नीचे बैठकर गपशप करते, ताश खेलते और एक-दूसरे के दुख-दर्द को बांटा करते थे। पक्का डंगा में माता लक्ष्मी माता का मंदिर है। यहां पर पीपल का पेड़ है। पेड़ के चारों ओर बैठने के लिए कच्चा डंगा था, इसे पक्का किया गया तो जगह का नाम पक्का डंगा पड़ा। बाजार महाराजा हरि सिंह के समय में बसाया गया था। करीब 100 साल पुराना बाजार है।
47 वर्षों में बहुत कुछ बदल गया यहां
मेरी उम्र 10 साल की थी, उस वक्त जब मैंने इस बाजार को समझना शुरू किया। आज मेरी उम्र 57 वर्ष है। हम लोग जिल्दसाजी करते हैं। शायद जम्मू में कोई नहीं जानता कि शंभूनाथ शर्मा ने डोगरी में रामायण लिखी थी। तब हमारे पास यह बाइडिंग के लिए आई थी। हमने उसे स्कैन कर रखा था, तब से यह हमारे पास है। लोग ढूंढते हुए आते हैं, इस किताब को। दरअसल एक डोगरे के लिए डोगरी में लिखी कोई चीज बहुत अहमियत रखती है, तभी हमने उसे भी रखा। 47 वर्षों में हमने बहुत कुछ देखा। ये वो बाजार था, दिवाली पर यहां अलग ही रौनक हुआ करती थी। स्टाल लगते थे, मेला लगता था। अब तो उस नजारे के लिए आंखें तरस गईं। जगह रही नहीं यहां। कौन आएगा यहां, हर कोई बाहर से ले लेता है या आनलाइन मंगाता है।
धर्मपाल डोगरा, जिल्दसाज
इन कारणों से बढ़ीं चुनौतियां
कारोबारी कहते हैं कि कारोबार धीरे-धीरे घटता जा रहा है। इसके दुकानदार कई कारण बताते हैं। यहां जाम से व्यापार प्रभावित है। इसके अलावा स्कूल बोर्ड द्वारा सत्र के दौरान समय पर किताबें न देना, प्रिंट की जगह स्टैंप रेट पर किताबें देने के अलावा काॅमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस परीक्षा पास करने के बाद छात्रों द्वारा दूसरे राज्यों का रुख करने से किताबों का व्यापार कम हो रहा है।
200 से ज्यादा दुकानें, पूरे प्रदेश को आपूर्ति यहीं से
पूरे प्रदेशभर में किताबें यहां से आपूर्ति होती है। पुराने समय से लेकर अब तक किसी भी संस्करण की पुस्तकें यहां से खरीदी जा सकती हैं। व्यापारियों के अनुसार 100 वर्षों से अधिक समय से यहां कारोबार किया जा रहा है। अब तीसरी पीढ़ी कारोबार से जुड़ी है। यहां पर 200 से ज्यादा दुकानें हैं। करीब 800 लोगों को रोजगार दिया जा रहा है। मौजूदा समय में हर रोज 5 लाख रुपये का कारोबार हर रोज होता है।
हर स्तर पर सुनाया दुखड़ा, पर समस्याएं दूर नहीं होतीं
कारोबारी कहते हैं कि कई बार समाधान के लिए बाजार एसोसिएशन की ओर से नगर निगम, डीसी और अन्य अधिकारियों के माध्यम से संपर्क किया गया। अभी तक समस्याओं से निजात नहीं मिल पाई है। इससे भी कारोबार पर विपरीत असर पड़ रहा है।
कारोबारियों ने गिनाईं समस्याएं- पक्का डंगा बाजार महाराजा हरि सिंह के जमाने से बसा है। अब यहां पर हमारी तीसरी पीढ़ी व्यापार कर रही है। अब व्यापार घटता जा रहा है। कारण है कि जाम के कारण लोग नहीं आना चाहते। इससे व्यापार दिनोंदिन कम होता जा रहा है। पहले ही बाजार छोटे हैं। अब स्मार्ट सिटी परियोजना में फुटपाथ बढ़ा दिए गए हैं। इससे चौड़ाई कम हो गई है। 12 फीट सड़क आठ फीट ही रह गई है। दो पहिया और बड़े वाहन जाम में फंस रहे हैं। लोग परेशान हो रहे हैं। फुटपाथ का निर्माण योजनाबद्ध तरीके से नहीं हुआ है।
वैभव गुप्ता, व्यापारी,
बाजार में किताबों का कारोबार कर रही है। व्यापार कम होने के कई कारण हैं। बाजार के नजदीक कोई भी पार्किंग नहीं है। लोग बाजार आते हैं तो जाम में फंसते। दूसरा कारोबार कम होने का कारण कामन यूनिवर्सिटी एट्रांस परीक्षा से हो रहा है। कालेजों में सीटें खाली रह जा रही है। छात्र परीक्षा में भाग लेने के बाद दूसरे प्रदेशों में पढ़ाई कर रहे हैं। पहाड़ी इलाकों के बच्चे परीक्षा में भाग नहीं ले रहे हैं। नई शिक्षा पालिसी से व्यापार को नुकसान हुआ है। किताबों की डिमांड नहीं आ रही।
- निश्चल आनंद, व्यापारी,
कालेजों में 15 हजार सीटें इस बार भरी ही नहीं गई। इससे सीधा कारोबार पर असर पड़ा है। नई शिक्षा पालिसी से व्यापार को नुकसान हुआ है। इससे किताबों का कारोबार घटता जा रहा है। इसके अलावा व्यापार को नुकसान स्मार्ट सिटी परियोजना के काम से भी हो रहा है। स्ट्रीट लाइटें खराब हैं। रात को बाजार में अंधेरा रहता है। वहीं, एक काम खत्म होता है तो दूसरा शुरू हो जाता है। यानी एक विभाग काम पूरा करेगा तो दूसरी आकर खुदाई कर देगा। इससे लोग बाजार आना नहीं चाह रहे।
- हरीश गुप्ता, अध्यक्ष, पक्का डंगा बाजार
किताबें प्रिंट रेट के हिसाब से बाजारों में आनी चाहिए। मौजूदा समय में स्टैंप रेट लगाकर किताबें बाजारों में उपलबध होती है। इससे किताबें खरीदने वाले लोग एतराज करते हैं। सीधा असर व्यापार पर पड़ता है। स्टैंप रेट दूसरे से तीन पेज पर किताबों में है। प्रिंट रेट कुछ ओर है जबकि स्टैंप रेट बढ़ा कर आता है। बोर्ड को किताबों में प्रिंट रेट ही अंकित करना चाहिए। इससे कारोबार में पारदर्शिता बनी रहेगी। व्यापार में बढ़ोतरी होगी। अकसर झगड़ने वाला काम होता है।
- गौरव महाजन, व्यापार,
100 साल से यहां पर दुकान हैं। पहले हमारे बुजुर्ग यहां पर कारोबार करते थे अब हम लोग कर रहे हैं। मौजूदा हालत यह है कि बाजार में ग्राहक नहीं आ रहे हैं। यहां पर मेट्रो चलाई जाए। इससे व्यापार में बढ़ोतरी होगी। पुराने शहर में लोग आराम से पहुंच सकेंगे। मौजूदा समय में बाजार में हर आधे घंटे बाद बाजार जाम हो जाता है। जब से स्मार्ट सिटी में काम हो रहे हैं। काम के कारण लोगों ने खरीदारी करना छोड़ दिया है। बाजार खुदे पड़े हैं। लोगों को खरीदारी के लिए पैदल चलना पड़ रहा है।
- राहुल महाजन, व्यापारी
जैम पोर्टल में किताबें उपलब्ध नहीं है। आर्डर किसे करें। जिन दुकानदारों ने पहले किताबों के लिए आर्डर किया है। इन के पैसों की अदायगी नहीं हो पाई है। सरकारी सुविधा का लाभ सही तरीके से नहीं मिल रहा है। हालांकि पैसों की अदायगी तीन माह के अंदर होनी चाहिए। व्यापारी इससे भी आहत हैं। सरकार को दुकानदारों को लाभ पहुंचाने के लिए सुविधाएं दी जानी चाहिए। कारोबार दिन प्रति दिन बढ़ने के बजाए कम हो रहा है। युवा पीढ़ी इस कारोबार से दूर भाग रही है। 50 फीसदी युवा ही कारोबार में रुचि ले रहे हैं।
- रेहान महाजन, व्यापारी
आनलाइन व्यापार में धोखाधड़ी पर नजर रखने के लिए कोई तंत्र नहीं है। पांच सौ रुपये के आर्डर पर घटिया स्तर की चीजे मिल रही है। इस पर नजर होनी चाहिए। आनलाइन व्यवसाय से स्थानीय बाजारों में असर पड़ रहा है। ठगी के मामले रोकने पर सरकार सख्त कदम उठाए। इससे कारोबार में बढ़ोतरी होगी। अकसर, हर साल सत्र शुरू हो जाता है मगर किताबें ही नहीं मिलती। जब दो से तीन माह हो जाते हैं तो बच्चों को किताबें उपलब्ध होती है। समय पर किताबें मिलनी चाहिए।
सचिन आनंद, व्यापारी