सीमा पर 45 दिनों तक चली पाक गोलाबारी ने स्थानीय ग्रामीणों को कई जख्म दिए हैं। इससे लोगों को उबरने में काफी वक्त लगेगा। गोलाबारी की चपेट में आकर घायल होने वाले जल्द स्वस्थ होकर खेतीबाड़ी में जुटने का इंतजार कर रहे।
वहीं जिस परिवार के सदस्य की जान गई, वह अभी भी सदमे में हैं। गोलाबारी का वह दृश्य उन्हें आज भी सिहरा कर रख देता है। गाढ़ी से बनाए मकानों को वह एकटक देखते रहते हैं, जो गोलाबारी से अब छलनी हो चुके हैं।
क्षेत्र के करीब 30 सीमांत गांवों के लोग गोलाबारी से प्रभावित हुए हैं। उनका काफी कुछ नुकसान हुआ है। 45 दिनों तक पाक द्वारा गोलाबारी करने के कारण सीमांत हल्का पिंडी चाढ़का कलां चंगिया, तरेवा, जग्वोआ तथा सेई के अलावा काकू दे कोठे, कठार आदि सहित करीब तीस गांवों में नुकसान हुआ है।
स्थानीय निवासी जनक सिंह, मदन लाल, जीत राज, प्रकाश चंद, दयाराम, कृष्ण लाल व देवराज का कहना है कि घरों को देखते ही हर कोई सोच में पड़ जाता है। महंगाई के समय में मुश्किल से हमने मकान बनाए थे। पाक गोलाबारी से मकान क्षतिग्रस्त हो गए हैं। कामकाज प्रभावित होकर रह गया है। ऊपर से अब मकानों की मरम्मत का खर्च।
इसकी वजह से सभी हताश-परेशान हैं। कई मकानों की छत तो मोर्टार के शेल गिरने से जर्जर हो चुके हैं। पशुशाला में खाली खूंटों को देखते ही आंसू निकल आते हैं। गोलाबारी ने कई पशुओं को मौत के मुंह में धकेल दिया। जान पर खेलकर धान की फसल लगाई थी।
लेकिन सात दिनों तक शिविरों में रहने के कारण फसल की देखभाल भी नहीं कर सके हैं। इस कारण फसल बर्बाद होने की चिंता सता रही है।