रियासत में सरकारी बसों की हालत देश के सभी राज्यों में खराब है। पिछले एक दशक से राज्य परिवहन निगम की बसों का आंकड़ा लगातार कम होता गया। साल दर साल बसें कंडम होती गई और नई बसें पैसे के अभाव में खरीदी नहीं जा सकती। इसी का नतीजा है कि राज्य में 60 हजार से अधिक लोगों पर औसत एक सरकारी बस चलती है।
जो दूसरे राज्यों की तुलना में कहीं पर नहीं टिकती। सरकारी बसों की हालत कुछ ऐसी है कि आधे से अधिक मरम्मत के अभाव में चलती ही नहीं। ऐसी हालत होने से आय भी कम हो रही है। जो इसे चलाने में नाकाफी है। सैकड़ों रूट पर एसआरटीसी की बसें नहीं चलतीं। राज्य परिवहन निगम के पास मौजूदा समय में 750 वाहन हैं।
इनमें 400 बसें शामिल हैं। इनमें से 300 ही एक वक्त पर चलती हैं। बाकी की मरम्मत और रिपेयर के अभाव में वर्कशाप में खड़ी रहती हैं। एक हजार ऐसे रूट हैं, यहां पर सरकारी बसें नहीं चलतीं। राज्य की आबादी सवा करोड़ है। राज्य के भीतर चलने वाली बसों की संख्या 200 है। कई जिलों में एक-एक बस चलती है।
जम्मू से राजोरी, पुंछ, किश्तवाड़ एक-एक बस चलती है। कश्मीर के लिए एक वक्त 50 बसें रोजाना चलती थीं, अब दस भी नहीं चलतीं।
अंतर्राज्यीय बसों का सहारा
एसआरटीसी के 750 वाहनों के फ्लीट की सालभर की कमाई 90 करोड़ रुपए है। इसमें से अंतर्राज्यीय बसों की हिस्सेदारी 30 करोड़ रुपए है। बाकी के 60 करोड़ में से 50 करोड़ ट्रकों का राजस्व है। बची हुई 10 करोड़ की कमाई भी श्रीनगर और कटड़ा में चलने वाली बसों से आता है।
अंतर जिला और जिला स्तर पर चलने वाली बसों की कमाई न के बराबर है। पिछले दो साल से राज्य परिवहन निगम अपनी कमाई से एक नई बस नहीं खरीद सका। पांच साल पहले जेएनयूआरएम के तहत निगम को 150 बसें मिली थीं। जिनको रियासत के भीतर चलना था, लेकिन इन बसों को अंतर्राज्यीय स्तर पर चलाया गया।
नतीजा, दस साल में कंडम होने वाली बसें पांच साल में ही कंडम हो गईं। पिछले चार साल में सिर्फ चार नई बसें निगम के पास पंजीकृत हुईं। पिछले दो साल से तो एक भी नहीं। दस साल पहले निगम के पास 1600 बसें थीं।
प्राइवेट यात्री वाहनों का दबदबा
राज्य में 10009 निजी बसें चल रही हैं। 14853 मिनी बसें चल रहीं। 37147 आटो रिक्शा चल रहे। करीब 60 हजार निजी यात्री वाहन चल रहे हैं। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्य में निजी यात्री वाहनों की संख्या कितनी हावी है। दरअसल, ट्रांसपोर्ट सेक्टर से जुड़े अधिकतर लोग राजनीतिक पार्टियों से हैं। इसलिए सरकारी बसों की तरफ कोई ध्यान नहीं देता।
आसान नहीं रिवाइव करना
परिवहन मंत्री अब्दुल गनी कोहली का कहना है कि एसआरटीसी को दोबारा पटरी पर लाने के लिए केंद्र से विशेष पैकेज मांगा जाएगा। एसआरटीसी के पास वाहनों की संख्या, रनिंग रूट आदि की डिटेल मांगी गई है।
एसआरटीसी की ऐसी हालत की समीक्षा होगी। निजी बसों का जाल पूरी तरह से हावी हो चुका है, जिसको हटाना एक कड़ी चुनौती है।
अन्य राज्यों से कोसों दूर
हिमाचल प्रदेश परिवहन निगम के पास 5000 से अधिक बसें हैं, पंजाब के पास दस हजार, आंध्र प्रदेश के पास 35 हजार, राजस्थान में डेढ़ लाख, दिल्ली में भी 20 हजार से अधिक सरकारी बसें चलती हैं। इसके आगे जम्मू-कश्मीर की 400 बसें शून्य के बराबर हैं।