अमर उजाला ब्यूरो
जम्मू। भारतीय जन संचार संस्थान (आईआईएमसी) के जम्मू परिसर में शुक्रवार को विशेष व्याख्यान का आयोजन किया गया। इसमें ''गुरु परंपरा और स्व का बोध : आत्म चेतना की यात्रा'' विषय पर चर्चा हुई। आयोजन भारतीय शिक्षण मंडल के सहयोग से हुआ। कार्यक्रम में आईआईएमसी और केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय जम्मू के शिक्षक और छात्र शामिल हुए।
मुख्य वक्ता प्रोफेसर एसपी सारस्वत ने कहा कि भारत की गुरु-शिष्य परंपरा ने वेदों, उपनिषदों और महाभारत जैसे महान ग्रंथों को जन्म दिया। हमें अपने पुराने ज्ञान पर गर्व करना चाहिए। समय आ गया है कि हम नए दौर के लिए भी सैकड़ों-हजारों ज्ञान ग्रंथ तैयार करें। जैसे प्राचीन काल में ताम्र पत्रों पर ग्रंथ लिखे गए। आज कंप्यूटर और तकनीक के सहारे बौद्धिक सृजन किया जा सकता है। आईआईएमसी जम्मू के क्षेत्रीय निदेशक डॉ. दिलीप कुमार ने कहा कि ''स्व'' का बोध यानी आत्मचेतना सिर्फ आध्यात्मिक विचार नहीं है बल्कि इससे समाज में बदलाव आ सकता है। जब व्यक्ति खुद को समझता है तो अपने कर्तव्यों को बेहतर निभाता है। इससे समाज में समानता, परिवारों में मजबूती और पर्यावरण के प्रति जागरूकता बढ़ती है।
डॉ. दिलीप ने यह भी कहा कि आज के समय में संयुक्त परिवार जैसी परंपराएं टूट रही हैं। इससे बच्चों में संस्कारों की कमी देखी जा रही है। उन्होंने पंच परिवर्तन की भावना को अपनाने और संस्कार, समाज और ‘स्व’ को एक साथ जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। इस दौरान डॉ. मणि प्रवीण तिवारी, प्रो. विनोद शर्मा, डॉ. विशाल शर्मा, डॉ. अमित शर्मा, डॉ. नरेंद्र शर्मा, डॉ. राजिंद्र मिश्रा, डॉ. रविंद्र सिंह भी मौजूद रहे।