जम्मू। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने एक फैसले में साफ कर दिया है कि अगर कोई नोटिस सही पते पर रजिस्ट्री डाक से भेजा गया है तो उसे विधि अनुसार डाक सेवा माना जाएगा, चाहे पावती (रसीद) न मिली हो। अदालत ने एक जवान की बर्खास्तगी को सही ठहराते हुए एकल पीठ के आदेश को रद्द कर दिया।
मामला बीएसएफ में जवान रहे अनंतनाग निवासी मोहम्मद शफी खान से जुड़ा है। वह एक दिन की छुट्टी लेकर गए और उसके बाद ड्यूटी पर लौटे ही नहीं। विभाग ने कई बार रजिस्ट्री डाक से उन्हें नोटिस भेजे लेकिन जवान ने कोई जवाब नहीं दिया। इसके बाद विभागीय जांच की गई और उन्हें सेवा से हटा दिया गया। खान ने बर्खास्तगी को अदालत में चुनौती दी और कहा कि उन्हें किसी भी जांच या कार्रवाई की जानकारी नहीं दी गई थी। एकल पीठ ने उनकी दलील मानकर बर्खास्तगी को रद्द कर दिया। इसके खिलाफ केंद्र सरकार और बीएसएफ ने डिवीजन बेंच में अपील दायर की।
अपील पर सुनवाई करते हुए न्यायाधीश और उनकी पीठ ने पूरे रिकॉर्ड की जांच की। अदालत ने पाया कि कारण बताओ नोटिस चार मई 2004 और 28 जून 2004 को रजिस्ट्री डाक से सही पते पर भेजे गए थे। खास बात यह रही कि खान ने खुद अपने एक पत्र में स्वीकार किया था कि उसे विभाग से नोटिस मिले थे। इसके बावजूद उसने कोई जवाब नहीं दिया। अदालत ने कहा कि अगर नोटिस सही पते पर भेजा गया है और न तो वह वापस आया और न ही पावती मिली तो विधिक अनुमान यही होगा कि वह डाक सेवा पूरी हो चुकी है। इस स्थिति में गैर प्राप्ति को साबित करने की जिम्मेदारी प्राप्तकर्ता पर होती है।
गलत जानकारी देकर राहत मांगने वाला न्याय का हकदार नहीं
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि बीएसएफ के कमांडेंट को अनुशासनात्मक कार्रवाई में जवान को बर्खास्त करने का अधिकार है। इसके लिए सुरक्षा बल न्यायालय में पेश करना जरूरी नहीं। अगर जवान को जवाब देने का अवसर दिया गया है और वह उसका लाभ नहीं उठाता तो इसे प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। अदालत ने खान को फटकार लगाते हुए कहा कि उसने सच को छुपाकर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की। कोर्ट ने कहा कि जो व्यक्ति गलत जानकारी देकर राहत मांगता है वह न्याय पाने का हकदार नहीं होता।