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अब कोई पार्टी जम्मू कश्मीर में सरकार बनाना नहीं चाहती, नाकामी का स्मारक बन गया था ये बेमेल गठबंधन

Tue, 19 Jun 2018 10:21 PM IST
दयाशंकर शुक्ल सागर, जम्मू
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Amit Shah-Mehbooba Mufti
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आखिर जम्मू कश्मीर में बेमेल गठबंधन टूट गया। इस गठबंधन से भाजपा को जम्मू में पहले काफी नुकसान हो चुका है। अब इस नुकसान का असर राष्ट्रव्यापी होता जा रहा था। कश्मीर पर भाजपा की एक कदम आगे और दो कदम पीछे हटने की रणनीति बुरी तरह फ्लाप हुई है। इसी महीने से अमरनाथ यात्रा शुरू हो रही है। इस यात्रा पर पत्थरबाजों का एक भी पत्थर भाजपा पर रहा सहा भरोसा खत्म कर देता। इसलिए महबूबा मुफ्ती के सिर ठीकरा फोड़ कर भाजपा सरकार से बाहर आ गई। लेकिन भाजपा को इसका कोई राजनीतिक लाभ मिलेगा यह कहना मुश्किल है। जम्मू कश्मीर के हालात चिन्ताजनक हैं। यही वजह है कि यहां अब कोई सरकार बनाना नहीं चाहता। न ही जल्दी कोई चुनाव कराना चाहता है।
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सूबे में कानून व्यवस्था नाम की कोई चीज नहीं रह गई है। दक्षिण कश्मीर के कई जिलों में आतंकवादी और उनके समर्थकों का साम्राज्य है। इसी इलाके से ईद पर अपने घर जा रहे फौजी औरंगजेब का दिनदहाडे़ अपहरण कर शाम तक उसका कत्ल कर इसका वीडियो जारी कर दिया गया था। इस फौजी का कसूर सिर्फ  यह था कि ये मेजर शुक्ला की उस टोली का शूटर था जिसने कई खूंखार आतंकी मार गिराए थे। इसी तरह राइजिंग कश्मीर के संपादक शुजात बुखारी की श्रीनगर के बीच बाजार में दिनदहाड़े गोली मार कर हत्या कर दी गई थी। यही पत्थरबाजों के साथ हुआ। महबूबा के दबाव में कोई दस हजार पत्थरबाज रिहा कर दिए गए। लौट के ये फिर पत्थरबाजी करने लगे। इन्होंने सुरक्षाबलों को निशाना बनाया। दर्जनों सैनिक घायल हुए। एक टूरिस्ट की मौत हुई। पूरा कश्मीर इन पत्थरबाजों के रहमो करम पर है। 

तो भाजपा-पीडीपी गठबंधन में गवर्नेंस का यह हाल है। न पर्यटक सुरक्षित हैं न पुलिस। हालात बद से बदतर होते जा रहे थे। रमजान पर सीजफायर के लिए कोई तैयार नहीं था। न सेना, न सुरक्षा बल, न जम्मू के वोटर, न जम्मू के भाजपा कार्यकर्ता। आतंकियों को रमजान पर राहत सिर्फ  महबूबा देना चाहती थीं ताकि कश्मीर में पीडीपी को थोड़ी राजनीतिक सहानुभूति मिले और उनके प्रति गुस्सा कम हो जाए। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। एक महीने के सीजफायर में आतंकियों ने अपनी ताकत और बढ़ा ली। इस दौरान हमारे सैनिक शहीद हुए। पाकिस्तान ने सीमा पर सीजफायर तोड़ा। सीमांत ग्रामीण मरे, कई बेघर हुए। सीजफायर के फैसले से देश भर में भाजपा की छवि बनी कि सत्ता के लिए वह किसी भी हद तक जा सकती है। सत्ता के लिए वह राष्ट्रहित से भी समझौता कर सकती है। इसीलिए अब भाजपा समर्थन वापस लेने के बाद राष्ट्रहित शब्द का प्रयोग बार बार इस्तेमाल कर रही है।
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Mehbooba Mufti - फोटो : File Photo
कश्मीर को लेकर भाजपा की ढुलमुल नीति का खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ा। खास बात ये कि इस गठबंधन सरकार में जितने सैनिकों की मौत हुई उतनी किसी सरकार में नहीं हुई। सबसे ज्यादा पत्थरबाजी इस गठबंधन सरकार में हुई। सबसे ज्यादा स्थानीय नागरिकों की मौत भाजपा-पीडीपी गठबंधन सरकार में हुई। सीजफ ायर के उल्लंधन की सर्वाधिक घटनाएं इसी गठबंधन में हुईं।

इस नाकामी की एक सबसे बड़ी वजह यह है कि जम्मू कश्मीर में भाजपा को सरकार चलाने का अनुभव बिलकुल नहीं। पीडीपी ने भाजपा को कोई काम नहीं करने दिया। हाईकमान से निर्देश थे कि महबूबा को परेशान न किया जाए। सो भाजपा विधायकों ने अपने वोटरों को परेशान करना शुरू कर दिया। रसाना रेप कांड, डेमोग्राफि क चेंज, रोहिंग्या आदि सभी मुद्दों पर भाजपा ने अपने वोटरों को अकेला छोड़ दिया। जैसे कश्मीर के लोग पीडीपी से खुश नहीं हैं उसी तरह के जम्मू के लोग भाजपा से  नाखुश हैं।

इसका नतीजा यह हुआ कि अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव में भाजपा को जम्मू की दो और लद्दाख की एक लोकसभा सीट पर हार साफ  दिखाई दे रही है। इसलिए भाजपा ने आनन फानन में अपने मंत्री दिल्ली बुलाकर गठबंधन तोड़ दिया। ताकि जहां तक हो सके डैमेज कंट्रोल किया जा सके। अब छह महीने का गर्वनर रूल भाजपा के लिए आखिरी मौका होगा।
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