सरकारी अस्पतालों में मरीज करीब पिछले एक महीने से नाश्ते के लिए तरस रहे हैं, लेकिन सरकार इस पर गंभीर होती नहीं दिख रही है। सरकार के उचित चिकित्सा के साथ पर्याप्त डाइट देने के दावे खोखले दिख रहे हैं। ठेकेदारों का लाखों रुपये बकाया न मिलने पर उन्हाेंने नाश्ते को बंद कर दिया था। जीएमसी और अन्य एसोसिएटेड अस्पतालों में पिछले 24 दिन से डाइट में मरीजों को नाश्ता मुहैया नहीं कराया गया है।
नाश्ते के लिए मरीजों को मजबूरन बाजार का रुख करना पड़ रहा है। नाश्ते के बंद होने के बाद दोपहर और रात के खाने (डाइट) पर भी संकट के बादल छा रहे हैं। ठेकेदारों का जीएमसी प्रशासन पर डाइट का करीब पौने दो करोड़ रुपये बकाया है। जीएमसी के अधीक्षक डा. रविंद्र रतनपाल के अनुसार फंड जारी होने पर डाइट का भुगतान किया जाएगा। डाइट के लिए सरकार को लिखा गया है।
मरीजों को नाश्ते में आधा लीटर दूध, चीनी का पाउच और चार ब्रेड पीस से वंचित रहना पड़ रहा है। एसोसिएटेड अस्पतालों में जीएमसी, एसएमजीएस, सीडी, साइक्रेटरी और सुपर स्पेशलिटी में रोजाना 1100-1200 मरीज प्रभावित हो रहे हैं। नाश्ते में दूध का ही करीब 42 लाख रुपये बकाया हो गया है। इससे फैक्ट्री मालिक ने दूध की सप्लाई बंद कर दी थी।
नाश्ते के बाद मरीजों को दोपहर की डाइट में एक दाल, सब्जी, चार चपाती, चावल तथा रात को चावल, चार चपाती और एक सब्जी दी जाती है। हफ्ते में दो दिन पनीर की सब्जी भी दी जाती है। इसमें औसतन प्रति मरीज पर एक दिन की डाइट पर साठ रुपये खर्च आता है।
ठेकेदारों का कहना है कि भुगतान न होने के कारण नाश्ते को बंद करना उनकी मजबूरी है। बाजार का कर्ज बढ़ जाने के साथ कर्मचारियों को नियमित वेतन देना भी मुश्किल हो रहा है।