सरहद पर तनाव है। सरहदी गांवों में मनहूसियत पसरी है। दर्द, बेबसी, गुस्सा और मजबूरी ने माहौल को इतना उदास और खामोश कर दिया है कि किसी का किसी से कुछ कहने-सुनने को जी ही नहीं करता। अमर उजाला की टीम रविवार को आधा दर्जन से अधिक गांवों में पहुंची। हर गांव में ऐसा लगता है, मानो रिप्ले चल रहा हो।
पाकिस्तान से आए गोलों से छलनी हुए दरो-दीवार, वीरान और उदास गली-चौबारे, अकबकाए और सहमे से मूक मवेशी, जान की हिफाजत के लिए घर छोड़कर शिविरों में शरण लिए आबाल-वृद्घ और अपने सवालों का जवाब न मिलने से खीजे व परेशान मासूम। यह मंजर बीते कुछ महीनों में दर्जन से अधिक बार देखने को मिल चुका है।
लोगों में दहशत कम बेचैनी और गुस्सा ज्यादा है। अब बर्दाश्त नहीं होता। हर कोई यही कह रहा है, कि अब तो पाकिस्तान की बोलती बंद करनी ही होगी। ज्यादा कुरेदो तो झुंझला उठते हैं। सरहद पार से बरसी बारूद ने जान-माल को ही नहीं मन को भी झुलसा दिया है।
भगवान भी पाक की गोलियों का निशाना बने
सीमा से करीब आधा किलोमीटर पहले आठ सौ लोगों की बस्ती है, गलाड़। यहां कुछ ही साल पहले बना शिव मंदिर भी शनिवार की शाम पाकिस्तानी गोलाबारी के निशाने पर आ गया गया। मंदिर के बाहर नंदी के बॉक्स का शीशा टूट गया। भीतर शंकर भगवान, पार्वती और कार्तिकेय के साथ विराजमान हैं। गोले के छर्रों ने उनका भी शीशा तोड़ दिया।
गांव के बुजुर्ग अंग्रेज सिंह बताते हैं कि कुछ माह पहले गोले बरसे थे तब महावीर जी के मंदिर में 11 गोले गिरे थे। ग्रामीणों का मानना है कि अब तो शंकर का तीसरा नेत्र खुलेगा ही खुलेगा। बैन, गलाड़, सुचेतपुर, कुल्लियां, चक फकीरा आदि गांवों को गोलाबारी के बाद खाली करा लिया गया था।
पशुओं को यहीं रहने दिया गया था। इन गांवों में जब हम पहुंचे तो पुलिस और प्रशासन का कोई नुमाइंदा नहीं मिला। नेशनल हाईवे से 12 किलोमीटर अंदर सीमा से सटे बैन में बरसे गोलों ने घरों की दीवारें, दरवाजे, दुकानों के शटर, वाहनों के शीशे सब चकनाचूर कर दिए।
अपने ही घर में मौत कब टपक पड़े
इससे कुछ ही पहले बने औद्योगिक क्षेत्र राखा मटाली में दूसरे राज्यों के सैकड़ों लोग हैं। चार दिन से चली गोलाबारी ने उनके परिवार वालों की भी नींद उड़ा दी है। वे बार-बार फोन कर उनका हाल-चाल पूछ रहे हैं। बच्चों की पढ़ाई चौपट है। जिन घरों में शादी-ब्याह होने हैं वे आशंकित हैं।
अपने ही घर में मौत कब टपक पड़े, कोई ठिकाना नहीं। मंगूचक्क की तोशी देवी अपने बेटे से बातें करते आंगन बुहार रही थी तभी सरहद पार से आए गोले ने उसके परखच्चे उड़ा दिए।
बेचारी आखिरी समय बेटे को छू तक नहीं सकी। रविवार को पूरा दिन शांति से गुजर गया। रात का पता नहीं। यही बदहवासी इनकी नियति बन गई है।