बीफ के बाद अब हिंदू श्राइन बिल
पर राजनीतिक घमासान मचेगा। रियासत में इस मुद्दे पर सियासी जंग की जमीन
लगभग तैयार हो चुकी है। घाटी में 90 के दशक में आतंकवाद बढ़ने से हुए
कश्मीरी पंडितों के पलायन के बाद कश्मीर में एक हजार से अधिक छोटे-बड़े
मंदिर बंद हो चुके हैं या रखरखाव के अभाव में बेहद खराब स्थिति में पहुंच
गए हैं।
कश्मीरी पंडितों की ससम्मान घर वापसी में देरी पर अब इन
मंदिरों के रखरखाव के लिए इस बिल पर राजनीति शुरू होना तय मानी जा रही है।
नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) मौजूदा सत्र में इस बिल को पास कराने के लिए जोर
लगा रही है।
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नेकां इस बिल के जरिये एक तीर से दो निशाने साधना चाह
रही है। एक कश्मीरी पंडितों का विश्वास जीतना और दूसरा सत्ताधारी दल भाजपा
को घेरना।
नेकां की रणनीति है कि विधानसभा सत्र में इस बिल के जरिये कम से कम भाजपा को घेरा जाए जो लगातार कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की बात तो करती है, लेकिन अब तक इस दिशा में कुछ भी किया नहीं गया है।
घाटी में न तो उनकी वापसी के प्रयास शुरू हुए हैं और न ही केंद्र तथा राज्य सरकार की ओर से कोई सकारात्मक प्रयास धरातल पर नजर आ रहे हैं। पीडीपी की इस संबंध में भाजपा से राय जुदा होने के चलते नेशनल कांफ्रेंस इस बिल के जरिए दोनों सत्ताधारी दलों में दूरियां बढ़ाने की भी कोशिश में है।
पिछले दिनों नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला ने भी कश्मीरी पंडितों को आश्वस्त किया था कि उनकी पार्टी विधानसभा में इस बिल को पारित कराने के लिए पूरा जोर लगाएगी।
उधर, भाजपा का भी कहना है कि पार्टी लगातार कश्मीरी पंडितों तथा घाटी के मंदिरों के रखरखाव के प्रति संवेदनशील है। पार्टी की कोशिश होगी कि कश्मीरी पंडितों को इसके रखरखाव का जिम्मा मिले और हिंदू श्राइन बिल रियासत में लागू हो।