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पाक का सितम, फिर कुदरत का कहर

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भारतीय सीमा से सटे गांव हमीरपुर कोना के लोग पहले पाक गोलीबारी का दंश झेल रहे थे और अब बाढ़ ने उन्हें बेघर कर दिया है। गांव के सैकड़ों परिवारों पर बाढ़ ने आफत ढाई है।
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गांव पूरी तरह से कट गया है। खेत खलिहान कहीं नहीं दिखाई पड़ते हैं। खेतों में लगाए गई मोटरों का तो नामोनिशान खत्म हो गया है। गांववासियों के तीन सौ से ज्यादा मवेशी बाढ़ में बह गए।

कमोबेश यही हालात आरएसपुरा सेक्टर के भी हैं जहां मूसलाधार बारिश से धान की फसल खराब हो गई है। वहीं प्रशासन का अभी तक इस पर ध्यान नहीं है। इससे किसानों में रोष है। आरएस पुरा का बासमती चावल काफी प्रसिद्ध है।
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लेकिन, यहां के किसानों की सुध नहीं ली जा रही। पहले पाकिस्तान द्वारा अकारण फायरिंग के चलते खेतीबाड़ी प्रभावित हुई। जब सबकुछ पटरी पर लौटने लगा तो कुदरत ने कहर ढाना शुरू कर दिया।

छोटे-छोटे बच्चे के ल‌िए पीने तक को दूध तक नहीं

मुसीबत का आलम यह है कि न सिर पर छत है और न ही जेब में कोई पैसा। दो जोड़ी कपड़ों के सिवाय लोग घरों से कुछ भी नहीं निकाल पाए और बेघर हो गए। बर्तन, बिस्तर, सामान कुछ नहीं बचा।

आनन-फानन में जैसे-तैसे छतों पर पहुंचे लोगों को सेना के हेलीकाप्टर द्वारा ज्यौड़ियां के गांव चक मलाला स्थित कम्यूनिटी हाल लाकर छोड़ा गया। खुद की जान बचाकर आए लोग जिंदा बचे हुए मवेशियों को गांव में ही छोड़ आए हैं।

लोगों को यहां रहने का आश्रय, दो वक्त की रोटी, पानी, चिकित्सा आदि की सुविधा तो मिल रही है लेकिन परेशानी यहीं खत्म नहीं हो रही है। परिवारों में आठ महीने से लेकर दो वर्ष तक के छोटे-छोटे बच्चे हैं।

दूध से लेकर कपड़े तक हर जरूरत के लिए लोग एक-दूसरे का मुंह ताक रहे हैं।  कम्यूनिटी हाल में 180 परिवार आश्रय लिए हुए हैं, जिनमें 250 महिलाएं और बच्चे हैं, जबकि 150 से ज्यादा परिवार अभी हमीरपुर के साथ लगते गांवों में फंसे हैं।
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दिल के आरमानों पर फिर गया पानी

तीन महीने बाद पूजा की शादी है। अरमानों से सहेजा शादी का सामान बाढ़ के पानी में बह गया। घर में कुछ भी नहीं बचा। उसकी मां पोली देवी ने बड़े चाव से उसके लिए डोगरी सूट बनाया था पर पूजा की शादी का जोड़ा भी पानी की भेंट चढ़ गया। पूजा के पापा रतन लाल कहते हैं कि गरीब पर खुदा की मार पड़ी है।

ठेके पर ली जमीन बह गई

पंजाब के साधु सिंह पिछले सात वर्षों से परिवार के साथ हमीरपुर में रह रहे हैं। ठेके पर जमीन लेकर सब्जियां लगाने का काम करने वाला परिवारों की सारी जमीन पानी में बह गई। कमाई का साधन गया, साथ ही की र्हुई कमाई को भी बहा कर ले गया। जमीन की किश्त देने के लिये रखे पैसे बाढ़ में बह गए।

चौथी बार ऐसा हुआ है

85 वर्षीय शंकरी देवी की बूढ़ी आंखों ने चौथी बार बर्बादी का यह मंझर देखा है। कंपकंपी आवाज में वह कहती हैं, गोलियों की गड़गड़ाहट की तो जैसे आदत सी हो गई कानों को लेकिन लगता है अब पानी के कहर की भी आदत डालनी होगी।
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