नंबरदार गुलाम शेख ने बताया कि बुजुर्ग के अंतिम संस्कार में शामिल होना यह उनका कर्तव्य था। इतना ही नहीं पड़ोसियों ने जरूरी चीजों को जुटाने में भी पीड़ित परिवार की सहायता की ताकि दुख की इस घड़ी में कुछ मदद हो सके।
ग्रामीण गुलाम हसन ने बताया कि यह हमारी संस्कृति है। हम पिछले कई दशकों से एक साथ रहते हुए हर घड़ी में एक दूसरे की मदद करते आ रहे हैं। सभी यहां एक समुदाय के रूप में रह रहे हैं। यही कारण है कि पंडित परिवारों ने कभी भी क्षेत्र से पलायन नहीं किया है।
कश्मीरी पंडित परिवार के रिश्तेदार प्यारे लाल भट ने कहा कि मुस्लिमों ने अंतिम संस्कार करते समय उन्हें हर संभव सहायता प्रदान की। सभी एक होकर रह रहे हैं यही हमारी पहचान है। भट ने बताया कि हम मुस्लिम भाइयों के शुक्रगुजार हैं जिन्होंने दुख की घड़ी में हमारी मदद की।