रियासत में भले ही कुछ तत्व नफरत की दीवार खड़ी करने में कोई कसर न छोड़ रहे हों, मगर मंदिरों के शहर जम्मू में कई मेहमान मुसलिम भाई ऐसे भी हैं जो हिंदुओं के साथ मिल कर भाईचारे और सांप्रदायिक सौहार्र्द की मिसाल दे रहे हैं।
दशहरा के लिए कुंभकरण, मेघनाद और रावण के पुतलों के निर्माण में मेरठ (यूपी) के ये मुसलिम कारीगर जुटे हैं। इनमें कई ऐसे हैं जिनकी कई पीढ़ियां इसी व्यवसाय से जुड़ी हैं। ये मुसलिम कारीगर भाई जातपात से ऊपर उठकर समाज को इंसानियत का संदेश दे रहे हैं। गीता भवन जम्मू में इन पुतलों को निर्माण किया गया है।
पिछले 22 वर्षों से इस पेशे से जुड़े डा. मोहम्मद ग्यासुदीन ने बताया कि राज्यभर के लिए करीब साठ छोटे बड़े पुतलों का निर्माण किया गया है।
मेरठ से आए 55 कारीगरों ने बनाया रावण का पुतला
विजयादशमी पर रावण दहन
- फोटो : File Photo
इसमें बड़े आयोजनों के लिए 55 से 60 और सामान्य में 25-30 फीट के पुतले तैयार किए गए हैं। शहर के प्रमुख परेड और गांधीनगर दशहरा ग्राउंड के अलावा संभाग स्तर पर पुंछ, राजोरी, सुंदरबनी, नौशेरा, अखनूर, आरएस पुरा, रियासी, उधमपुर, लेह आदि स्थानों के लिए पुतले भेजे गए हैं।
यह व्यवसाय किसी धर्म और जातपात से जुड़ा नहीं है। यहां ऐसे कई हिंदू और मुसलिम कारीगर हैं जो सालों से पुतलों का निर्माण कर रहे हैं। इस बार ग्राम मेना पुट्ठी तहसील सरदना, मेरठ यूपी से 55 कारीगर पुतलों का निर्माण करवाने पहुंचे।
असम से बांस, मेरठ से वेस्ट पेपर, दिल्ली से पुराने कपड़े
विजयादशमी पर रावण दहन
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पिछले 32 वर्ष से पुतलों का निर्माण कर रहे मोहम्मद रिहान ने कहा कि कारीगरों में मोहम्मद अंसार, चंदू खान, मुकिम खान, जसवीर, लीलू गिरि, काली सिंह, राज कुमार आदि जुटे हैं। पुतलों के निर्माण में असम से बांस, मेरठ से वेस्ट पेपर, दिल्ली से पुराने कपड़े, सेबा, पेंट आदि का प्रयोग किया जाता है।
इस साल परेड मैदान पर रावण के पुतले की कमर से चारों ओर विशेष प्रकार के आग के फव्वारे आकर्षण का केंद्र रहेंगे। आतिशबाजी में यह पहली बार प्रयोग किया जा रहा है।