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वो 3 मुद्दे जिन पर टिका है मुफ्ती का भविष्य

Mon, 02 Mar 2015 02:51 PM IST
बशीर मंज़र/बीबीसी, श्रीनगर
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भाजपा और पीडीपी की भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में सरकार बनने के बाद अब लोगों का ध्यान गठबंधन सरकार पर केंद्रित हो रहा है। यह गठबंधन आसान नहीं रहने वाला जिसके संकेत मुख्यमंत्री, मुफ्ती मोहम्मद सईद के पहले दिन ही 'सही ढंग से हुए चुनाव' के लिए पाकिस्तान की भूमिका पर बयान से मिल गए। मुख्यमंत्री मुफ्ती के लिए यह गठबंधन बड़ी चुनौती है और उन्हें संभलकर चलने के साथ ही कुछ बातों पर खास ध्यान देने की ज़रूरत रहेगी।
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बयानबाज़ी और विवादों का खतरा
मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद अपनी पहली प्रेस कॉंफ्रेंस में मुफ्ती ने कहा कि पाकिस्तान और अलगाववादियों ने राज्य में सही ढंग से चुनाव में मदद की। मजेदार बात यह है कि उन्होंने जम्मू-कश्मीर के लोगों, सुरक्षा बलों और चुनावकर्मियों को श्रेय देने पर कुछ नहीं कहा।

इस बयान के बाद बहस का बाजार गर्म हो गया और मुफ्ती को यह संदेश मिल गया कि वह एक नाजुक गठबंधन चला रहे हैं और इसके छह साल तक चलने की गारंटी के लिए उन्हें ऐसी बातों की सूची बनानी होगी जिन्हें वो कहें या फिर न कहें। यह सही है कि मुफ्ती कश्मीर मुद्दे पर बातचीत और पाकिस्तान और अलगाववादियों के साथ सकारात्मक बातचीत चाहेंगे लेकिन उन्हें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सत्ता में उनके साथ भागीदार भाजपा के लिए यह असहज न हो।
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भाजपा के आधारक्षेत्र में लोग पहले ही इस बात से नाखुश हैं कि पार्टी ने अपने मुख्य मुद्दे- धारा 370 को हटाने- पर 'समझौता' कर लिया है और पीडीपी को कुछ ज्यादा ही 'छूट' दे दी है। ऐसी स्थिति में रविवार को दिए गए मुफ्ती के बयान जैसी और परिस्थितियां गठबंधन को ही खतरे में डाल सकती हैं।

सेना से कैसा रहे रिश्ता?
इसके अलावा मुफ्ती को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि सेना से टकराव न हो। उमर अब्दुल्लाह सरकार के कार्यकाल में मुख्यमंत्री और सेना के बीच तनातनी ही रही। उमर ने सेना से बात किए बिना विवादित अफस्पा कानून को हटाने की वकालत की और अपने कार्यकाल के दौरान एक के बाद एक विवादों को बुलावा देते रहे।

दूसरी बात इस विवादित कानून पर अपने रुख से समझौता किए बिना मुफ्ती को यह तय करना होगा कि वे सेना से कैसे सकारात्मक रिश्ते रख पाएं।

यहां यह कहना सही होगा कि 1990 में जब से भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में चरमपंथ के संबंध में पाकिस्तान की भूमिका का जिक्र जोरशोर से होने लगा, तब से किसी भी सरकार के लिए भारतीय सेना के नज़रिए को नजरअंदाज़ करना आसान नहीं रहा है।

क्षेत्रीय विभाजन
तीसरी बात मुफ्ती को यह भी सुनिश्चित करना होगा कि उनकी पार्टी या गठबंधन सहयोगी (भाजपा) में से कोई भी ऐसी बात न कहे जिससे क्षेत्रीय विभाजन बढ़े। पिछले कुछ समय से राज्य के दोनों हिस्से कश्मीर और जम्मू क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा के संदर्भ में अलग-अलग रास्ते पर बढ़ते लग रहे हैं, ये खाई गंभीर होती जा रही है।

अब जबकि एक तरह से दोनों पार्टियां, जो दो क्षेत्रों की कट्टर विचारधारा का प्रतिनिधित्व करती हैं, साथ आई हैं तो यह संभव है कि यह दरार पाटी जा सके। और इसकी जिम्मेदारी मुख्यमंत्री पर ही होगी। एक और बात मुफ्ती को यह भी तय करना होगा कि ऐसे वायदे करने से परहेज करें जिन्हें वह पूरा नहीं कर सकते। उमर ने अपने कार्यकाल के दौरान ऐसे वायदे किए जिन्हें पूरा नहीं कर सके और हास्य का पात्र बने।

उन्होंने हर परिवार को नौकरी का वायदा किया और नाकाम रहे थे। उन्होंने बिजली बिल में कमी का वायदा किया, लेकिन उन्हें इसे बढ़ना पड़ा था। उन्होंने अफस्पा को हटाने का वायदा किया लेकिन इस मुद्दे पर वह एक इंच भी आगे नहीं बढ़ पाए थे। इसलिए मुफ्ती को यह सुनिश्चित करना होगा कि वह ऐसे वायदे करें जो व्यावहारिक हों, जिन्हें पूरा किया जा सके, यानी उन्हें लोकप्रिय नारों से बचना होगा।

मुफ्ती को दोनों समुदायों - हिंदू और मुसलमानों के धार्मिक अधिकारों को लेकर बहुत सतर्क रहना होगा। साल 2008 में राज्य में अमरनाथ भूमि विवाद को लेकर जम्मू और कश्मीर बुरी तरह विभाजित हो गया था। यह गठबंधन नाजुक और मुश्किल है लेकिन अगर आपसी समझदारी और सामंजस्य से चलाया गया तो यह राज्य के क्षेत्रीय और धार्मिक विभाजन को पाटने में ऐतिहासिक साबित हो सकता है।
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