साल 2018 में 110 आतंकियों को घुसपैठ करते हुए मार गिराया गया। 147 आतंकियों को मुठभेड़ में मारा गया। बावजूद इसके सुरक्षा एजेंसियों की चुनौतियां कम नहीं हुईं। दक्षिण कश्मीर का इलाका और एलओसी पर होने वाली घुसपैठ अब भी निरंतर सुरक्षा एजेंसियों के लिए सिरदर्द बनी हुई है। सुरक्षा एजेंसियों ने यह भी माना है कि आतंकियों का इंटेलीजेंस नेटवर्क भी दोबारा जिंदा हुआ है। आतंकियों का ऐसा नेटवर्क 1990 में था, जिसे सुरक्षा एजेंसियों ने ध्वस्त कर दिया था।
बीते साल पीओके से एलओसी क्रास कर 140 आतंकी कश्मीर में पहुंचे। इनमें अधिकतर आतंकी जैश-ए-मोहम्मद के थे। दक्षिण कश्मीर के चार जिलों कुलगाम, अनंतनाग, पुलवामा और अनंतनाग के 100 युवक बीते साल आतंकवाद में शामिल हुए। बीएसएफ और सेना की हुई एक बैठक में इस पर गहरा मंथन किया गया। बात सामने आई कि घुसपैठ को रोकने के लिए कुछ और महत्वपूर्ण कदम उठाने होंगे।
क्योंकि न तो कश्मीर में स्थानीय युवाओं की आतंकवाद में होने वाली भर्ती कम हो रही है और न ही उस पार से आने वाले आतंकियों की गिनती। 130 विदेशी आतंकी अब भी कश्मीर में सक्रिय हैं। ऐसे में कुछ और करना होगा। यह भी मंथन किया गया है कि जिस तरह से 1990 में आतंकवाद के दस्तक देने पर आतंकियों का इंटेलीजेंस नेटवर्क काम करता था। उसी तरह से अब दोबारा काम कर रहा है।
दक्षिण कश्मीर में शायद ही कोई ऐसी मुठभेड़ हुई, जिसमें आतंकियों को बचाने के लिए स्थानीय लोग आगे न आए हों और सुरक्षाबलों पर पत्थर न फेंके हों। आतंकियों के जनाजे में भी लोग पहुंचते हैं। आतंकियों को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिल रहा है, तो आतंकवाद खत्म करने में बाधा डाल रहा है। दक्षिण कश्मीर के इलाके पर विशेष ध्यान देने की जरूरत बताई गई है।