बड़े हादसों के बाद भी मेटाडोर चालक नहीं चेत रहे। शहर में दौड़ने वाली अधिकतर मेटाडोरों में तेज आवाज में गाने बजते हैं। इससे चालक का ध्यान तो बंटता ही है, साथ ही सवारियों को भी परेशानी होती है।
इस मामले में ट्रैफिक पुलिस की सख्ती का भी असर नहीं दिखाई देता है। आए दिन हादसों की खबरें सुर्खियां बनती हैं। जांच में या घायलों के बयान से पता चलता है कि मेटाडोर सवारियों से ओवर लोड होती है। वहीं चालक का पूरा ध्यान वाहन पर नहीं होता है। चालकों की ओर से मोबाइल फोन पर बात करना भी आम बात है।
बुधवार को रियासी के बलोनी नाले में 300 फीट गहरी खाई में गिरी मेटाडोर मामले में भी वाहन चालक की लापरवाही की बात सामने आ रही है। इस हादसे के घायलों ने बताया कि चालक मस्ती के साथ मेटाडोर चला रहा था। उसने वाहन में गाने तेज आवाज में चला रखे थे। बड़ी लापरवाही यह बताई कि चालक वाहन चलाते समय फोन का प्रयोग कर रहा था।
जम्मू शहर में दो हजार से अधिक मेटाडोर चलती है। मेटाडोर चालक यूनियन के पदाधिकारी और आरटीओ जम्मू समय-समय पर चालकों के लिए कैंप लगाते हैं। इसमें यातायात नियमों के बारे में उन्हें जानकारी दी जाती है कि चालक नशे की हालत में गाड़ी न चलाएं।
यातायात नियमों का पालन करे, मेटाडोर स्टॉपेज पर ही वाहन का ब्रेक लगाएं, लेकिन यह सब बातें पदाधिकारियों और आरटीओ के भाषण तक ही सीमित होकर रह जाती हैं। मेटाडोर में सवार होते ही यह सब बातें हवाई साबित होती हैं।
सवारी उठाने को लगा देते हैं रेस
मेटाडोर चालकों द्वारा सवारी उठाने की होड़ में रेस लगाते भी आम तौर पर देखा जाता है। इस दौरान वह मेटाडोर में बैठी सवारियों की परवाह तक नहीं करते। लोग तेज रेस लगाने से मना करते हैं, लेकिन मेटाडोर चालकों पर इसका कोई असर नहीं पड़ता है। जानीपुर, अखनूर रोड, बख्शीनगर, बीसी रोड, कनाल रोड, गांधीनगर, त्रिकुटानगर, सतवारी, चट्ठा आदि सभी रूटों पर दौड़ने वाले मेटाडोर चालकों का यही हाल है, जिसका परिणाम हादसों के रूप में सामने आता है।