भारी विवादों के बीच जेल से रिहा हुए अलगाववादी मसर्रत आलम का मानना है कि उसकी रिहाई किसी के रहमो करम पर नहीं हुई है। यह एक सामान्य कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा है। सरकार का इससे कोई लेना-देना नहीं। आलम ने इस बात को सिरे से नकार दिया कि सरकार और उसमें किसी तरह की कोई डील हुई है, ताकि अलगाववादियों और केंद्र के बीच बातचीत का रास्ता खुल सके।
उसने कहा कि पब्लिक सेफ्टी एक्ट के तहत 2010 से वह जेल में था और अब इसकी मियाद समाप्त हो चुकी है। उसने कहा कि पिछले 20 सालों से मैं जेल के अंदर-बाहर होता रहा हूं। यह कोई नई बात नहीं है। मुसर्रत ने कहा कि यदि राज्य में सरकार बदली है, तो इसका यह मतलब नहीं कि जमीनी हकीकत में कोई बदलाव हुआ है।
परिवर्तन जम्मू कश्मीर की स्थिति में कोई प्रभाव नहीं डालता। सिर्फ रियासत के लोग ही इसे बदल सकते हैं। आलम ने कहा कि उसकी रिहाई को लेकर हाय-तौबा मच रही है, तो यह उनकी सिरदर्दी है, जो हल्ला कर रहे हैं।
सरकार और हुर्रियत के बीच दोबारा बातचीत शुरू होने की बात है तो इसका निर्णय हुर्रियत कांफ्रेंस में लिया जाएगा। मुस्लिम लीग हुर्रियत कांफ्रेंस का एक हिस्सा है। बातचीत को लेकर कांफ्रेंस में जो भी निर्णय लिया जाएगा। वह उसका पालन करेगा।