इस समुदाय का इलाके का ज्ञान और मौसमी उपस्थिति उन्हें जागरूकता और प्रतिरोध की पहली पंक्ति बनाती है: लेफ्टिनेंट जनरल अता हसनैन
अमृतपाल सिंह बाली
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी समूह अपनी रणनीति में बदलाव के तहत अब ऊंचाई वाले इलाकों में पनाह ले रहे हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि सुरक्षाबलों खासकर सेना के लिए अपनी रणनीति पर पुनर्विचार करने का समय आ गया है। उन्हें गुज्जर और बकरवाल समुदाय का विश्वास फिर से हासिल करने के लिए प्रयास करने होंगे।
इन जनजातियों के लोगों को पहाड़ों की आंख और कान माना जाता है। जमीनी स्तर पर खुफिया जानकारी की कमी को दूर करने के प्रयास करते हुए जम्मू-कश्मीर पुलिस ने उत्तरी कश्मीर से खानाबदोश समुदायों के साथ बातचीत की शुरुआत की।
पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि उत्तरी कश्मीर रेंज के जम्मू कश्मीर पुलिस के डीआईजी मकसूद उल जमान के निर्देशानुसार जम्मू- कश्मीर पुलिस ने उत्तरी कश्मीर में खानाबदोश समुदायों के साथ बातचीत के प्रयास शुरू किए। इसकी शुरुआत उत्तरी कश्मीर के बारामुला जिले से हुई जब पुलिस द्वारा ब्रथपथरी बेहक लच्छीपोरा बिजहामा में खानाबदोश समुदाय के साथ एक संवादात्मक सत्र आयोजित किया गया।
इस पहल का उद्देश्य पुलिस और ऊंचाई वाले इलाकों में रहने वाले खानाबदोश समुदाय के बीच बेहतर समन्वय को बढ़ावा देना था जो आमतौर पर पुलिस सेवाओं से दूर रहते हैं। पुलिस ने समुदाय के सदस्यों को पूर्ण सहयोग, समर्थन और सुरक्षा का आश्वासन दिया और क्षेत्र में शांति और व्यवस्था बनाए रखने के लिए निरंतर आपसी विश्वास और सतर्कता की आवश्यकता पर बल दिया। बता दें कि पुलिस के एक अधिकारी ने बताया कि भविष्य में अन्य इलाकों में भी ऐसे सत्र आयोजित किए जाएंगे ताकि इन समुदायों के लोगों के साथ संबंध और मज़बूत बनाए जा सकें।
एक सैन्य विशेषज्ञ ने बताया कि सुरक्षाबलों और दोनों समुदायों के बीच अविश्वास बढ़ा है जो खुफिया जानकारी जुटाने के लिए खतरा पैदा कर सकता है। लगभग 23 लाख की कुल आबादी वाले गुज्जर और बकरवाल समुदाय, पीर पंजाल के दुर्गम इलाकों की गहरी जानकारी और अटूट वफादारी के कारण दशकों से सेना के लिए महत्वपूर्ण सहयोगी रहे हैं और यह जम्मू कश्मीर में खासकर कश्मीर घाटी में आतंकवाद को कम करने में महत्वपूर्ण कारक रहा है। उन्होंने बताया कि कई घटनाओं ने आपसी संबंध को टूटने के कगार पर ला खड़ा किया और दशकों के विश्वास को कमजोर कर दिया।
इनमें 2018 का कठुआ दुष्कर्म मामला और 2020 का अमशीपुरा फर्जी मुठभेड़ शामिल है जिसमें तीन गुज्जर युवकों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। विशेषज्ञ बताते हैं कि इन घटनाओं ने गुज्जर और बकरवाल युवाओं को अलग-थलग कर दिया है जिससे जमीनी स्तर पर खुफिया जानकारी का एक खतरनाक अभाव पैदा हो गया है। स्थिर संचार अवसंरचना की कमी कुशल खुफिया जानकारी प्रदान करने की उनकी क्षमता को भी कमज़ोर करती है जिससे क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए लंबे समय से आवश्यक साझेदारी खतरे में पड़ जाती है।
वहीं कश्मीर घाटी में सेना की संभालने वाली चिनार कोर (15 कॉर्प्स) के पूर्व जीओसी लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) सैयद अता हसनैन ने अमर उजाला के साथ विशेष बात करते हुए कहा कि गुज्जर-बकरवाल समुदाय जम्मू-कश्मीर के सबसे दुर्गम और बीहड़ इलाकों में रहने वाला मानव समुदाय है। ठीक वही इलाके जहां आतंकवादी शरण लेते हैं। इस समुदाय का इलाके का ज्ञान और मौसमी उपस्थिति उन्हें जागरूकता और प्रतिरोध की पहली पंक्ति बनाती है।
उन्होंने कहा कि इन समुदायों के लोगों के साथ विश्वास बहाली के लिए संयुक्त कदम उठाने की ज़रुरत है। जनरल हसनैन ने कहा कि यह जरूरी है कि सेना और प्रशासन समावेशिता (समुदाय के सदस्यों को सुरक्षा बलों में शामिल करना), कल्याण, उनकी खानाबदोश परंपराओं के प्रति सम्मान और निरंतर संपर्क के माध्यम से उनका विश्वास बनाए रखें। उनका दिल जीतना सिर्फ वफादारी नहीं है बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि दुश्मन के लिए कोई भी जगह, चाहे कितनी भी दूर क्यों न हो, उपलब्ध न रहे।
गौरतलब है कि सैन्य विशेषज्ञों के अनुसार इस समुदाय की महिला वीडीसी (विलेज डिफेंस कमेटी) सदस्यों ने वर्ष 2003 में सफल ऑपरेशन सर्प विनाश- जो अब तक का जम्मू कश्मीर का सबसे बड़ा आतंकवाद रोधी ऑपरेशन रहा है, में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस दौरान पुंछ-सुरनकोट सेक्टर के हिल काका में भारी सुरक्षा वाले बंकरों से लगभग 78 आतंकवादी मार गिराए गए थे।