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जम्मू कश्मीर: पीडीपी की गुगली से बिखरे भाजपा के विकेट

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पीडीपी की गुगली से भाजपा के विकेट छितरा गए हैं। भाजपा ने पीएमओ के राज्यमंत्री जितेंद्र सिंह को विधायक दल का नेता बनाकर जम्मू कश्मीर में गठबंधन सरकार के नेतृत्व का स्पष्ट संकेत दिया था। लेकिन, समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। पीडीपी किसी भी हालत में भाजपा को मुख्यमंत्री का पद देने के मूड में नहीं दिखती है।
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साथ ही अफस्पा की वापसी जैसी कठिन शर्त्त रखकर पीडीपी ने भाजपा की मुश्किलें बढ़ा दीं हैं। भाजपा ने अनुच्छेद 370 के मुद्दे को चुनाव में ही किनारे कर दिया था, इसलिए यह मुद्दा अब गठबंधन में बाधक नहीं है। लेकिन, अफस्पा की वापसी की शर्त मानना केंद्र सरकार और सेना के लिए संभव नहीं है।

इस बीच, कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने फोन पर पीडीपी संरक्षक मुफ्ती मोहम्मद को बधाई देकर सियासी पारा चढ़ा दिया है। असमंजस की स्थिति के बाद दो निर्दलीय विधायकों ने पाला बदलने के संकेत दिए हैं। इससे भाजपा के मिशन मुख्यमंत्री को गहरा झटका लगा है।
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अपनी शर्तों पर भाजपा के गठबंधन: पीडीपी

सियासी हलचल के बीच कार्यवाहक मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला पिता फारूक अब्दुल्ला से मिलने लंदन रवाना हो गए हैं। पीडीपी नेता मुजफ्फर हुसैन बेग से भाजपा महासचिव राम माधव की मुलाकात उत्साहवर्द्धक नहीं रही थी। बेग ने पीडीपी की ओर से कठिन शर्तें रखकर भाजपाई सपने पर ग्रहण लगा दिया।

पीडीपी के नए विधायकों में से कई भाजपा और पीडीपी के संभावित गठबंधन के खिलाफ हैं, लेकिन, अपनी शर्तों पर भाजपा के साथ ही गठबंधन चाहते हैं। अब यह गठबंधन उसी हालत में संभव है जब भाजपा की ओर से पीडीपी की बड़े भाई वाली भूमिका स्वीकार कर ली जाए।

दरअसल, जम्मू कश्मीर आतंकवाद पीड़ित राज्य है और सूबे की माली हालत खस्ता है। ऐसे में केंद्र सरकार की उदार मदद और सक्रिय सहयोग के बगैर किसी भी सरकार के लिए खासी मुश्किलें पेश आ सकती हैं। यह बाध्यता पीडीपी को भाजपा से गठबंधन के लिए प्रेरित करती है।

निर्दलीय बिगाड़ सकते हैं खेल

दूसरी ओर, राज्यसभा में विपक्ष के नेता गुलाम नबी आजाद ने नेकां, पीडीपी और कांग्रेस को मिलाकर महा गठबंधन का प्रस्ताव रखा है। पीडीपी इसे व्यवहारिक नहीं मानती है। कश्मीर में पीडीपी और नेकां पारंपरिक प्रतिद्वंदी हैं और उनका मेल संभव नहीं दिखता। नेकां ने पहले पीडीपी को समर्थन की बात कही और बाद में उमर ने साफ कर दिया कि उन्होंने लिखित समर्थन नहीं दिया है।

उमर के लंदन से लौटने तक नेकां अब किसी गठजोड़ की बातचीत में शिरकत नहीं करेगी। जाहिर है कांग्रेस और भाजपा में ही शह-मात का खेल खिंचेगा। उधर, निर्दलीय विधायक इंजीनियर रशीद और पीडीएफ विधायक हकीम यासिन के सुर बदल रहे हैं। पहले ये दोनों भाजपा के खेमे में थे और अब किसी भी गठबंधन में जाने को तैयार दिखते हैं।

कोर इश्यू पर समझौता नहीं करेगी पीडीपी

पीडीपी के मुख्य प्रवक्ता नईम अख्तर ने साफ कर दिया है कि पार्टी कोर इश्यू पर किसी दल से समझौता नहीं करेगी। अनुच्छेद 370 से छेड़छाड़ कबूल नहीं होगी और अफस्पा की क्रमवार तरीके से वापसी भी पीडीपी चाहती है। मुख्यमंत्री के मुद्दे पर पीडीपी सार्वजनिक तौर पर कहने से बच रही है।

अख्तर ने कहा कि अब तक किसी दल से बातचीत इस स्तर पर नहीं पहुंची है जहां सीएम के कार्यकाल पर चर्चा की जा सके। उन्होंने माना कि पीडीपी की बातचीत भाजपा और कांग्रेस से चल रही है। कांग्रेस के समर्थन का प्रस्ताव विचाराधीन है।

विधायक दल और राजनीतिक मामलों की समिति की बैठक में सारे मुद्दों पर चर्चा और अन्य दलों से बातचीत के बाद पीडीपी गवर्नर को सरकार बनाने का प्लान सौंपेगी।
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स्थायी सरकार के लिए पीडीपी-भाजपा गठबंधन

जम्मू में भाजपा को और कश्मीर में पीडीपी को जनादेश मिला है। यही गठबंधन स्थायी सरकार बना सकता है। भाजपा-नेकां और निर्दलीय मिलकर सरकार बनाते हैं तो विधायकों का अधिकतम आंकड़ा 46 तक पहुंचता है।

यह बहुमत के लिए जरूरी अंक 44 से महज दो अंक आगे है। इस सरकार को निर्दलियों के पैंतरों से खतरा बना रहेगा। इसी तरह पीडीपी-कांग्रेस के गठबंधन की संख्या 40 पर पहुंचती है।

सीपीएम विधायक एम वाई तारिगामी और दो निर्दलियों का समर्थन यह संख्या 43 तक ले जाता है जो बहुमत से एक कम है।
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