शिकायत पर सीबीआई और एसीबी ने प्रारंभिक जांच में पाया कि तत्कालीन क्षेत्रीय अधिकारी हेमराज ने मिलीभगत से राकेश कुमार चौधरी को ठेका दिलाया, जिसमें नियमों को ताक पर रखा गया। ठेकेदार के पास न तो इसकी पात्रता थी और न ही टेंडरिंग प्रक्रिया की अनिवार्य शर्तों को पूरा किया गया। ठेकेदार की ओर से कई जाली दस्तावेज भी पेश किए गए। इन तमाम पहलुओं को कमेटी सदस्यों के संज्ञान में लाया जाना चाहिए था।
जांच में जब अजय कुमार रजक व अन्य सदस्यों से पूछा गया तो पता चला कि कमेटी चेयरमैन ने अपने स्तर पर ही अपात्र आवेदक के नाम टेंडर करवाने की व्यवस्था करवा दी। प्रारंभिक जांच करने के बाद 24 मार्च बुधवार को इस मामले में उक्त आरोपियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर ली गई। अब मामले में आगे की कार्रवाई होगी।
हाईवे की ओर से जारी टेंडर में दूसरी कम बोली मोहनदास द्वारा लगाई गई थी। लेकिन इनकी बोली को पूरी तरह निरस्त किया गया। इस आवेदक के साथ चर्चा तक नहीं की गई। मोहनदास ने इस मामले को कोर्ट में भी उठाया था। बावजूद इसके कोई कार्रवाई नहीं की गई। जांच में भी यह भी पाया गया कि राकेश कुमार चौधरी ने जो अनुभव प्रमाणपत्र दिया, उसमें जिस कार्य को अपना अनुभव बताया, वो कहीं शामिल नहीं था।